विशेष रिपोर्ट : उत्तराखंड में रक्षाबंधन का गौरवशाली इतिहास और इसकी 3 बेहद खास परंपराएं
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!देहरादून : भारतवर्ष में जहां रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के पवित्र बंधन के रूप में हर्षोल्लास से मनाया जाता है, वहीं उत्तराखंड में रक्षाबंधन का इतिहास पौराणिक गाथाओं, ऐतिहासिक युद्धों और धार्मिक विधाओं से जुड़ा है। उत्तराखंड में इसे ‘श्रावणी उपाकर्म’ या ‘सावनी’ के नाम से भी जाना जाता है। प्रदेश के पर्वतीय जनपदों में इस दिन सिर्फ बहनें ही नहीं, बल्कि पुरोहित भी यजमानों को रक्षासूत्र बांधते हैं। आइए जानते हैं उत्तराखंड में राखी से जुडी कुछ सबसे अनोखी एवं ऐतिहासिक परम्पराएं :
1. चंपावत की ऐतिहासिक ‘बग्वाल’ (पाषाण युद्ध का इतिहास)
उत्तराखंड में रक्षाबंधन के दिन कुमाऊं मंडल के चंपावत जिले के देवीधुरा में मां वाराही देवी के प्रांगण में आयोजित होने वाला ‘बग्वाल मेला’ दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसका इतिहास सदियों पुराना है, प्राचीन काल में यहां :
- नरबलि की प्रथा का अंत: लोक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में मां वाराही को प्रसन्न करने के लिए यहां के चार खामों (चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगड़िया) द्वारा हर साल एक मनुष्य की बलि (नरबलि) दी जाती थी।
- बूढ़ी मां की तपस्या: एक बार एक वृद्ध महिला के इकलौते पोते की बलि की बारी आई। वंश नाश के डर से उस मां ने मां वाराही की कठोर तपस्या की। देवी ने प्रसन्न होकर नरबलि बंद करने का आदेश दिया, लेकिन बदले में एक मानव के बराबर रक्त चढ़ाने की शर्त रखी।
- पत्थरों का युद्ध: तभी से चारों खामों के लोग रक्षाबंधन के दिन मंदिर परिसर में इकट्ठा होकर एक-दूसरे पर पत्थरों की बौछार करते थे, जिसे ‘बग्वाल’ या पाषाण युद्ध कहा जाता है। जब मुख्य पुजारी को आभास होता है कि एक इंसान के खून के बराबर रक्त बह चुका है, तो वह शंख बजाकर युद्ध रोक देते हैं।
- आधुनिक स्वरूप: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद अब पत्थरों की जगह फूलों और फलों (सेब, नाशपाती आदि) से यह बग्वाल खेली जाती है, जो सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है।
2. चमोली का बंसी नारायण मंदिर (साल में सिर्फ राखी पर खुलने वाले कपाट)
गढ़वाल मंडल के चमोली जिले की उर्गम घाटी में समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित बंसी नारायण मंदिर का उत्तराखंड में रक्षाबंधन से सीधा ऐतिहासिक संबंध है
- साल में केवल एक दिन दर्शन: छठी से आठवीं शताब्दी के बीच बने इस मंदिर के कपाट साल के 365 दिनों में से सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही सूर्योदय पर खुलते हैं और सूर्यास्त पर अगले एक साल के लिए बंद हो जाते हैं।
- पौराणिक इतिहास: मान्यता है कि जब भगवान विष्णु राजा बलि के दान से प्रसन्न होकर पाताल लोक में उनके द्वारपाल बन गए थे, तब माता लक्ष्मी दुखी हो गईं। नारद मुनी के सुझाव पर लक्ष्मी जी ने पाताल लोक जाकर राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और उपहार में अपने पति (भगवान विष्णु) को वापस मांग लिया।
- प्रकट होने का स्थान: माना जाता है कि पाताल लोक से मुक्त होने के बाद भगवान विष्णु इसी स्थान पर पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। इसलिए रक्षाबंधन के दिन इस घाटी की महिलाएं भगवान विष्णु (बंसी नारायण) को पहली राखी बांधती हैं और उनके लिए मक्खन-मिश्री का भोग तैयार करती हैं।
3. श्रावणी उपाकर्म और जनेऊ बदलने की परंपरा
- उत्तराखंड में रक्षाबंधन को मुख्यतः ब्राह्मणों और पुरोहितों का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है।
- यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार: इस दिन कुमाऊं और गढ़वाल के लोग पवित्र नदियों और घाटों (जैसे देवप्रयाग, हरिद्वार, बागेश्वर) पर एकत्रित होकर विशेष स्नान करते हैं। वे ऋषियों का तर्पण करते हैं और अपने पुराने जनेऊ को बदलकर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
- यजमानों को रक्षासूत्र: पर्वतीय अंचल में आज भी ब्राह्मण अपने यजमानों के घर-घर जाकर उनकी कलाई पर वैदिक मंत्रोच्चार (जैसे- ‘येनबद्धो बली राजा…’) के साथ रक्षासूत्र बांधते हैं और बदले में यजमान उन्हें आदरपूर्वक दक्षिणा देते हैं।
4. ‘जोल’ और प्रकृति संरक्षण का पर्व
कुछ हिस्सों में उत्तराखंड में रक्षाबंधन का संबंध कुछ क्षेत्रों में सीधे प्रकृति की रक्षा से भी है। पहाड़ों में लोग इस दिन अपने पालतू पशुओं (गाय, बैल) को भी रक्षासूत्र बांधते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘जोल’ कहा जाता है। इसके अलावा, पर्यावरण की रक्षा के संकल्प के रूप में पेड़ों पर राखी बांधने की ऐतिहासिक परंपराएं भी इस क्षेत्र में देखी जाती हैं।
