देहरादून : उत्तराखंड की सबसे पुरानी क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के भीतर लंबे समय से सुलग रहा असंतोष अब पूरी तरह से ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा है। आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी यूकेडी को उस वक्त एक बड़ा संगठनात्मक झटका लगा, जब पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूर्व केंद्रीय उपाध्यक्ष और तेजतर्रार नेता आशुतोष नेगी को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। दल के इस औचक और बड़े फैसले ने उत्तराखंड के सियासी हलकों में खलबली मचा दी है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष कुकरेती ने इस कड़े फैसले की पुष्टि करते हुए साफ किया कि संगठन के भीतर अनुशासनहीनता और पार्टी को कमजोर करने की किसी भी कोशिश को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आशुतोष नेगी पर यह गाज केंद्रीय अनुशासन समिति की रिपोर्ट और लगातार मिल रही शिकायतों के बाद गिरी है।
शीर्ष नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोलने और भ्रामक बयानबाजी का आरोप
पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, उत्तराखंड क्रांति दल की केंद्रीय अनुशासन समिति ने पिछले कुछ समय से आशुतोष नेगी की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी हुई थी। समिति ने शीर्ष नेतृत्व को लिखित पत्र भेजकर अवगत कराया था कि आशुतोष नेगी लगातार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर भ्रामक, मनगढ़ंत और तथ्यहीन बयानबाजी कर रहे हैं।
अनुशासन समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि नेगी के इन बयानों से न केवल जनता के बीच पार्टी की छवि धूमिल हो रही थी, बल्कि संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट रहा था। उन पर लगातार पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने और संगठन की मर्यादा को तार-तार करने के गंभीर आरोप लगे हैं।
पहले छिनी थी कुर्सी, पर नहीं संभले हालात
यह पहला मौका नहीं है जब आशुतोष नेगी के खिलाफ दल ने कोई कार्रवाई की हो। इससे पहले भी उनकी बयानबाजी को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें कड़ी चेतावनी दी थी। सुधार न होने पर पार्टी ने अनुशासनात्मक कार्रवाई के पहले चरण के तहत उनसे ‘केंद्रीय उपाध्यक्ष’ जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वापस ले ली थी।
पार्टी नेतृत्व को उम्मीद थी कि पद से हटाए जाने के बाद वे संगठन की मुख्यधारा में लौटकर अपनी कमियों को सुधारेंगे, लेकिन इसके विपरीत वे लगातार पार्टी विरोधी एजेंडे को हवा देते रहे। उत्तराखंड क्रांति दल अध्यक्ष कुकरेती के अनुसार, चेतावनी और पद छीनने के बावजूद आशुतोष नेगी के रुख में कोई बदलाव नहीं आया और वे लगातार पार्टी को भीतर से कमजोर करने का काम कर रहे थे। इसी वजह से अंततः उन्हें 6 साल के लिए निष्कासित करने का बेहद कड़ा फैसला लेना पड़ा।
विवादों से पुराना नाता, सोशल मीडिया पोस्ट पर भी दर्ज हो चुकी है FIR
आशुतोष नेगी का विवादों से नाता नया नहीं है। उत्तराखंड की राजनीति और जनमुद्दों पर मुखर रहने वाले नेगी हाल ही में एक बड़े कानूनी फेरबदल में भी फंसे थे। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक कथित आपत्तिजनक, भ्रामक और अमर्यादित पोस्ट साझा करने के आरोप में उनके खिलाफ पौड़ी कोतवाली में प्राथमिकी (FIR) भी दर्ज की गई थी। इस मामले ने भी राज्य की राजनीति में काफी तूल पकड़ा था। पार्टी के भीतर और बाहर लगातार बन रहे विवादों ने उनके निष्कासन की जमीन तैयार कर दी थी। इस राजनीतिक घटनाक्रम की अधिक जानकारी के लिए आप ETV Bharat Uttarakhand पर इस रिपोर्ट को पढ़ सकते हैं।
चुनाव से ऐन पहले बढ़ी यूकेडी की मुश्किलें
उत्तराखंड क्रांति दल, जिसने राज्य गठन के आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाई थी, पिछले कुछ समय से अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। आगामी चुनाव को लेकर पार्टी राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खिलाफ एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प बनने का दावा पेश कर रही थी।
ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर जब पूरी पार्टी को एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरना था, तब आंतरिक गुटबाजी और इतने बड़े नेता का निष्कासन यूकेडी के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस निष्कासन से जहां एक तरफ पार्टी ने कड़ा संदेश देने की कोशिश की है, वहीं दूसरी तरफ इससे संगठन के भीतर की गुटबाजी खुलकर चौराहे पर आ गई है, जिसका सीधा असर आने वाले चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।
फिलहाल, आशुतोष नेगी के निष्कासन के बाद उत्तराखंड क्रांति दल के भीतर अंदरूनी कलह थमती है या अन्य असंतुष्ट सुर भी मुखर होते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि इस फैसले ने राज्य के सियासी तापमान को भारी ठंड के बीच भी अचानक बढ़ा दिया है।

