नई दिल्ली: हिंदी साहित्य जगत के वयोवृद्ध और मूर्धन्य साहित्यकार बल्लभ डोभाल (96 वर्ष) का शनिवार को निधन हो गया। रविवार को दिल्ली के ऐतिहासिक निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान और भावभीनी विदाई के साथ संपन्न हुआ। उनके निधन की खबर से साहित्य, पत्रकारिता और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पुत्रों ने दी मुखाग्नि, अंतिम विदाई में उमड़ा साहित्य जगत
निगमबोध घाट पर दिवंगत साहित्यकार बल्लभ डोभाल के पुत्रों—प्रकाश डोभाल और कैलाश डोभाल ने नम आंखों से चिता को मुखाग्नि दी। इस दुखद घड़ी में उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए देश के जाने-माने साहित्यकार, संपादक और पत्रकार बड़ी संख्या में मौजूद रहे। अंतिम संस्कार में पंकज बिष्ट, महेश दर्पण, राजा खुगशाल, भगवती प्रसाद डोभाल, डॉ. रोशन गौड़, कैलाश धूलिया, रमेश ध्यानी और राजेश डंडरियाल सहित अनेक दिग्गजों ने घाट पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति
वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार प्रोफेसर प्रदीप कुमार वेदवाल ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा, “साहित्यकार बल्लभ डोभाल जी का जाना हिन्दी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को बेहद प्रभावशाली और जीवंत अभिव्यक्ति दी। उनका लेखन हिंदी संसार के लिए हमेशा एक अमूल्य धरोहर रहेगा।”
देश-विदेश से आ रहे शोक संदेश, याद आया ‘तिब्बत की बेटी’ का दौर
साहित्यकार बल्लभ डोभाल की पुत्री प्रभा थपलियाल ने बताया कि पिता के अवसान का समाचार मिलने के बाद से ही देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी उनके प्रशंसकों और पाठकों के शोक संदेश व टेलीफोन लगातार आ रहे हैं। पिता के साहित्यिक संसार को याद करते हुए भावुक मन से प्रभा ने उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘तिब्बत की बेटी’ सहित अनेक कृतियों के रचनाकाल और प्रकाशन के दौर से जुड़े संस्मरण साझा किए।
पीढ़ियों को प्रेरित करेगी डोभाल जी की विरासत
मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल (गांव बोरिख) में 30 मार्च 1930 को जन्मे साहित्यकार बल्लभ डोभाल ने ‘आधी रात का सफर’, ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ और ‘कोलाज’ जैसी तीन दर्जन से अधिक कालजयी पुस्तकों की रचना की। वे जीवनभर किसी नौकरी या बंधन में बंधने के बजाय स्वतंत्र लेखन करते रहे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक उनके लेखन के प्रशंसक रहे हैं। भले ही डोभाल जी आज पंचतत्व में विलीन हो गए हैं, लेकिन उनका विपुल साहित्य और वैचारिक विरासत आने वाली कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।
