उत्तराखंड के गांवों की तस्वीर पेश करती भगवती जुयाल गढ़देशी की
रचना-गौं त गौं हुन्दिन
आजकल नेता जी और उनके समर्थक गांव गांव घूम रहे है। उम्मीद है इस दौरान वो गांवों की हालत से भी रूबरू
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!हो रहे होंगे। उनके ज्ञानार्थ यह कविता बताती है कि हमारे पहाड़ी गांव कैसे होते थे।
रचनाकार – भगवती जुयाल गढ़देशी
गौं त गौं हुन्दिन
गौं त गौं हुन्दिन रख्वाल होंदा कुल देवता
भै बंद एकी खाण्या मिली जुली रैंदा
तभी त मेरू गौं मेरू तीर्थ जन बणदा
अलै बलै दुखः बिमरीम मिली दड़ु देंदा
हौंसिया उल्लार अपणैस निजरखू जींदा।
चोरी चकरी नि ढकेंदा न मोरू द्वार
थात्या संस्कारून गठ्ययां शील सदाचार
ऊंचू पैंछू ह्यवार व्यवाहरौ जख बरतरू
स्वीणौं गाणी ह्वे गैन दिखेणा हपार।
देवता पूजै नचदा छया देव ह्वे खिलपत
अब त देवता भी बोनै ह्वयान छीं अछप
सजदा छा जख रात्यूं पंडौं का मंडाण
ढोल दमौ महाभारतै कथा जगरतै रस्याण।
अब कख रै वु समौ सौभ प्रवासी ह्वे गेंनी
रौ रिवाज भै भयातै पछणाक बिसरी गैनी
ब्वन क्या दिदौं अब त खौलेंण बकि रैगे
स्वीणौ देखेणा न दिल्वा दंदोल बकि रैगैन
ह्वे क्या जु इनु अंगलतु देखेणु छायी
अपणु ल्वे पुछणू टपरै कि लाटा कखौ छैंयी
रंगमता ह्वे गौं गलौं घरू खुस रेंदा छायी
मवसी नामान नि दिखेंदी दौख देखणु छायी।
धाणी अंदाल गोरू बखरौं कु लराट
दाना सयणौं कु सजला ह्वका गगड़ाट
घसेन्यूं मुंडेसू धवड़ी करदोड़ा दथुड़ी
तिवरि डिंडलि नौन्याल्वी बगदि नकुड़ी।
कैमा लाण खौरी जु सूणू टक लगै
याद कौरी वूं दिनु अपणा दिलू तैं लगै
आखिर गौं छिन हमार छ जलम भूमी
श्रृण च वी थात्यू जख पल्या बड्यां सैंती।
