अच्छा हुआ जो गांव की सड़क बंद रही ……

इस बार गांव जाना हुआ तो बारिश की वजह से गांव को जाने वाली सड़क  टूट चुकी थी तो कई वर्षों बाद सबको फिर से वही पुराने रास्ते गांव जाना पड़ा।  एक तरह से ये ठीक भी हुआ क्योंकि ये वक्त था वर्षों पहले की यादों को ताजा करने का। सड़क से निचे उतरकर स्वच्छ नदी (आटा गाड़) जिससे जुडी अनेकों यादों की परतें धीरे धीरे खुलती चली गयी फिर वहां से 2  किलोमीटर की सीधी चढ़ाई जो कभी लोग बमुश्किल 15 मिनट में चढ़ जाते थे आज वही चढ़ाई चढ़ने में जान आफत में आ गई लेकिन उस राह की अनगिनत कहानियों व हसीं पलों ने उस  सारी थकान को रोमांच में बदल दिया।  जो भी गांव में मिलता बस उसकी जुवां पे यही निकलता कि इस चढ़ाई ने थका तो दिया लेकिन उन पलों की परतों को भी खोल दिया जो वर्षों से दिलों में जमी पड़ी थी। 


नदी पर बने घट (घराट) जो वर्षों पूर्व बंद हो चुके थे मुझे लगा कि वो आज जीवंत हो चुके है। गांव के लोगों का सिरोली बाजार में सोसाइटी  (राशन की दुकान) से गेहूं लाकर घट में पीसना और फिर भारी भरकम पहाड़ के पथरीले रास्तों से गुजर कर बड़ी आसानी से अपने घरों को जाना आज वो दृश्य आँखों को सकूँ दे रहा था। घट से जुड़े सभी के अनुभव व यादों की पोटली को लिए मैं आगे बढ़ रहा था और मन गदगद हुए जा रहा था। 


 

सभी अपने अपने स्कूली दिनों को स्मरण कर अपनी शरारतों को एक दूसरे से सांझा कर रहे थे तो जवानी में आटा गाड़ में कैसे मछलियां (फिश) पकड़ने के नए नए पैतरों के किस्से व छोटे बच्चों के पैर पकड़ पानी के अंदर ले जाकर छोड़ देने की नादानियों पर हँसते हँसते गांव की और बढ़ रहे थे।  क्या  बताऊं  ऐसा लग रहा था जैसे हम वास्तव में स्वर्ग की धरा पर आगे बढ़ रहे है और रोमांच बढ़ता जा रहा है। 

अगर गांव की सड़क बंद न होती तो शायद इतना आनंद व मधुर यादों का वो रोमांचकारी साथ हमें कभी न मिलता 

©द्वारिका चमोली 

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