उत्तराखंड जौनसार क्षेत्र में दशहरे के दिन मनाते है पांइथा पर्व

और होता है गागली युद्ध 


दशहरा 2021: आज एक ओर जहां सारा देश बुराई के प्रतीक रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतलों का दहन करता है वही उत्तराखंड के जौनसार इलाके के लोग इस दिन श्राप से मुक्ति पाने के लिए दो बहनो की प्रतिमा को जल में विषर्जित करने की परंपरा को निभाते हैं । 

क्या है परंपरा 

जौनसार के स्थानीय लोगों के मतानुसार सदियों पूर्व उद्पाल्टा गांव में एक परिवार की रानी और मुन्नी नाम की दो सग्गी बहनें थी जो अपने नित्य कर्म में रोज कुएं से पानी भरने जाती थी लेकिन एक दिन अचानक से मुन्नी का पांव फिसल गया और वो कुएं में डूबकर मर गई जिसके लिए परिवार और गांव के लोगों ने रानी को दोषी ठहराया और रोज उसे ताने देकर प्रताड़ित करने लगे। रोज-रोज की प्रताड़ना से तंग आकर एक दिन रानी ने भी कुएं में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। दोनों बहनो की इस तरह अकाल मृत्यु होने से कुछ दिनों बाद परिवार एवं गांव के लोगों पर उनके श्राप का असर दिखाई देने लगा। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए दशहरे के दिन पांइथा पर्व मनाते हैं। 

दशहरे पर होता है गागली युद्ध 

समय के साथ साथ रानी और मुन्नी के वंसज दो गांवों में विभाजित हो गए उदपाल्टा और कुरोली किन्तु आज तक वे लोग इस श्राप से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इससे मुक्ति पाने के लिए ही दोनों गांवों में दशहरे के दिन पांइथा पर्व मनाने की परंपरा है। इसके लिए अष्टमी के दिन दोनों बहनों की घास की प्रतिमा बनाकर पूजा जाता है और फिर दशहरे के दिन जल में विसर्जित कर दिया जाता है। कहा जाता है कि आज भी श्राप से मुक्ति पाने के लिए इन दोनों गांवों के बीच गागली युद्ध होता है। जिसे देखने के लिए आस-पास के गांवों से हज़ारों की संख्या में लोग आते है। 

प्रतिवर्ष मनाए जाने वाले पांइथा पर्व के पीछे लोगों की धारणा ये है कि जिस दिन दोनों गांवों में एक ही दिन व एक ही समय पर दो कन्याओं का जन्म होगा उस दिन हम रानी और मुन्नी के श्राप से मुक्त हो जायेंगे । 

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