मालू (लता काचनार) बदल सकता है उत्तराखंड के बेरोजगार युवाओं की स्थिति 

उत्तराखडं में वर्षों से चली आ रही परम्पराएं जो मानव जीवन व पर्यावरण के लिए बहुत ही उपयोगी थी आधुनिकता के दिखावे में कही खो सी गयी है। वो कहते हैं न पेड़ अगर अपनी जड़ छोड़ दे तो वो सूख जाता है वही हालत इस समय उत्तराखंड के भी देखने को मिल रहे है। नब्बे के दशक पूर्व ये सभी परम्पराएं लगभग वैसी ही चलती थी जैसे इनकी संस्कृति थी किन्तु इसके बाद युवाओं का शहरों की ओर रुझान करते ही उनके साथ साथ यहाँ की सभी परम्पराएं भी विलुप्त सी होती गई।  पहले मोटे अनाज, प्रकृति से प्राप्त सब्जियां व खाने में उपयोग होने वाले बर्तन भी सांस्कृतिक, धार्मिक व पर्यावरण के अनुकूल होते थे। जंगलों से प्राप्त वनस्पतियां भी उस काल में मानव जीवन का अंग हुआ करती थी उन्ही वनस्पतियों में से एक है मालू का पौधा। 

शुद्ध, शुभ व बहुत उपयोगी है मालू (लता काचनार ) 

मालू जिसे हिंदी में लता काचनार के नाम से जाना जाता है और इसका वानस्पतिक नाम बाहुनिया वाहली है। यह निचले स्तर से लेकर ऊँची पहाड़ियों तक में पाया जाता है। इस पौधे को बहुत ही शुद्ध माना गया है इसीलिए उत्तराखंड में पहले धार्मिक अनुष्ठानों में और विवाह कार्यों में इसकी पत्तियों से तैयार पत्तल, पूड़े और पूजा सामग्री का ही इस्तेमाल किया जाता था। मालू सदाबहार पौधा होने के साथ ही औषधियों गुणों से भी भरपूर है इसीलिए इसको पशुचारे के रूप में उपयोग किया जाता है। इसकी छाल और फूल भी काफी उपयोगी होते है। छाल से चटाई बनाई जाती है वहीं इसके फूलों से भौरों द्वारा बनाया गया शहद औषधि के काम में लाया जाता तो इसकी लकड़ी ईंधन के काम आती है। छप्पर के घरों में छत बनाने के लिए भी इसके पत्तों को उपयोग में लाया जाता है। आज के दौर में जब हर चीज में प्लास्टिक का उपयोग हो रहा है तो पत्तल दोने कैसे छूट सकते है। आजकल सिंगल यूज प्लास्टिक से बनी प्लेटें, दोने, गिलास चम्मच न केवल स्वास्थ्य  के लिए हानिकारक है अपितु पर्यावरण को भी दूषित करते है।  वहीं औषधीय गुणों से भरपूर मालू के पौधे को वेद व पुराणों में भी शुद्ध व शुभ  माना गया है जो पर्यावरण को बिलकुल भी नुकसान नहीं पहुंचाता। 

औषधीय गुण लिए हुए  

मालू के पौधे न केवल शुद्ध होते है अपितु इनमें रोगों से लड़ने की क्षमता भी होती है इस कारण से वैज्ञानिकों और चिकित्सको के अनुसार इसमें कई एंटी बैक्टीरियल गुण मौजूद होते है जिसके कारण ये कई रोगों में बहुत ही असरकारक सिद्ध होता है। बुखार, अतिसार, खांसी, जुकाम व पाचन क्रिया में इसे लेने से काफी आराम दिखाई देता है और शरीर के अंदर बनी गांठो को ठीक करने के लिए भी यह काफी उपयोगी है। इसमें लिपिड 23.26, प्रोटीन 24.59 और फाइबर 6.21 प्रतिशत होते है। 

सिंगल यूज प्लास्टिक का बन रहा पर्याय 

अब जब पूरे विश्व में लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे है और सिंगल यूज प्लास्टिक एवं थर्माकोल से होने वाले नुकसान को देखते हुए वे प्राकृतिक रूप से तैयार मालू के पत्तों से बनी समाग्री का प्रयोग करने लगे है जिससे न केवल वो अपने स्वास्थ्य को दूरस्थ रखने में कामयाब हो रहे अपितु इस्तेमाल के बाद इससे उन्हें जैविक खाद भी मिल रही है और पर्यावरण भी शुद्ध हो रहा है। विदेशों में तो आज के समय में इसकी काफी मांग हो रही है। यूरोप के होटलों में तो इससे बनी प्लेटों को उपयोग में लाना शुरू कर दिया और वे इसे काफी मात्रा में इसे इस्तेमाल भी कर रहे है। एक ओर जहां उत्तराखंड ने अपने इस पारम्परिक व्यवसाय को ख़त्म कर दिया है वहीं जर्मनी में तो ये फैशन बन चुका है और वहां ये एक बड़े व्यवसाय के रूप में फल फूल रहा है। इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए उत्तराखंड का युवा व्यवसायी भी इस उद्योग में हाथ आजमाने लगे है। इस समय उत्तराखंड के प्रत्येक जिले में NGO व महिला समूहों ने इस व्यवसाय की ओर ध्यान देना शुरू किया है और उत्तराखंड के कुछ गांवों में शादी व्याह में फिर से इन पत्तलों का उपयोग देखने को मिल रहा है जिसे देखते हुए लग रहा है कि उत्तराखंड में  ये व्यवसाय एक रोजगार के रूप में  उभर कर सामने आ रहा है। यदि वहां की सरकार इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को प्रोत्साहन दे तो उनकी आर्थिकी में ये मील का पत्थर साबित हो सकता है। 

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