कंडोलिया मंदिर जिसका कुमाऊं और गढ़वाल की धार्मिक आस्था से

है संबंध 

भगवान शिव से जुडी अनेकों कथाएं व उनके स्वरूपों की चर्चा उत्तराखंड की धरती पर अक्सर देखने व सुनने को तो मिलती ही है बल्कि उनका वर्णन इतिहास में भी मिलता है। उनका ऐसा ही एक स्वरुप गोलू देवता के रूप में भी सामने आता है जिसकी लोग कंडोलिया भगवान के रूप में भी पूजा करते है। 

उत्तराखंड के पौड़ी नामक स्थान से 2 किलोमीटर की दूरी पर चीड़, देवदार, बांज बुरांश के घने जंगल के बीच स्थित है भगवान कंडोलिया का मंदिर। पौड़ी गांव के लोगों के इष्टदेव के रूप में वो यहां विराजमान हैं, गांव के लोग मानते है कि भगवान हमारी हर प्रकार से रक्षा करते है इसलिए वे इन्हें भुम्याल देव भी मानते हैं । कहते हैं जब इंसान हर ओर से निराश हो जाता है और कहीं से भी न्याय मिलने की उम्मीद ख़त्म होने लगती है तब कंडोलिया देवता की शरण में आकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने से उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है, यही कारण है कि कंडोलिया देवता कि न्याय के देवता के रूप में भी पूजा की जाती है। 

मंदिर से जुडी प्रचलित मान्यताएं 

वर्षों पूर्व जब उत्तराखंड में भी राजा महाराओं का शाशन होता था तो उस समय के लोग स्थान परिवर्तन करते रहते थे। ऐसे में वे आवश्यकता की जरुरी चीजों के साथ साथ अपने इष्टदेव को भी अपने साथ ले जाते थे। कहते हैं चंपावत क्षेत्र के डुंगरियाल नेगी जाती के इष्टदेव गोलू देवता हैं जिन्हें गोरिल या गोल्ज्यू देवता भी कहते हैं। ये लोग चंपावत छोड़ जब पौड़ी में बसे तो अपने इष्टदेव को भी साथ लाये और वहीं  एक मंदिर में उनकी स्थापना की। कहते हैं ये सभी लोग बुजुर्ग थे इसलिए देवता को एक कंडी में रखकर लाये थे। 

दूसरी मान्यता ये है कि चंपावत की एक कन्या का विवाह पौड़ी गांव के सुपुत्र से हुई थी। विदा होते समय लड़की ने अपने इष्टदेव गोलू महाराज को कंडी में रखकर अपने साथ ससुराल ले आई जहाँ उसके ससुरालियों ने उन्हें स्थापित कर उनका मंदिर बनाया और उन्हें अपना इष्टदेव मानने लगे। 

स्थानीय लोगों के अनुसार एक बार रात को सोते हुए गांव के एक व्यक्ति को सपने में देवता ने दर्शन दिए और उन्हें कहा कि मेरा यह स्थान गहराई में है और मैं किसी ऊँचे स्थान पर रहना चाहता हूँ। उन्होंने यह बात गांव में बताई और सभी ने एक राय से  भगवान का मंदिर पौड़ी से लगभग 2 किलोमीटर ऊपर बनाया। चूंकि देवता को पौड़ी कंडी से लाया गया था तो गांव के लोगों ने इन्हें कंडोलिया देवता के नाम से पुकारने लगे धीरे धीरे जब यहां आकर लोगों की मुराद पूरी होने लगी तो मंदिर की ख्याति भी बढ़ने लगी और लोग इसे कंडोलिया देवता के नाम से जानने लगे जिसके कारण इस स्थान का नाम भी कंडोलिया पड़ गया। 

इस मंदिर में हर वर्ष 3 दिवसीय पूजा का आयोजन किया जाता है जिसमें स्थानीय व प्रवासी सभी भाग लेते है और अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट चढ़ाते है और अपनी मुरादें रखते हैं। जिनकी मुराद पूरी हो जाती है वे मंदिर में घंटी या फिर भंडारे का आयोजन करते हैं। 

धार्मिक होने के साथ साथ पर्यटक स्थल भी है

कंडोलिया मंदिर एक रमणीक स्थल है और इसके पास ही एक खूबसूरत पार्क भी है। पौड़ी से नज़दीक और सड़क मार्ग से जुड़े होने की वजह से लोग यहाँ दर्शनों के साथ साथ प्रकृति का आनंद भी उठाते हैं। इस ऊंचाई वाले स्थान से लोग गंगोत्री व अन्य हिमशिखरों तथा गैंगवारस्यूं घाटी के मनमोहक दृश्यों का दृष्टिलोकन कर आत्मविभोर होते हैं।  

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