पहाड़ के एक बुजुर्ग के संघर्षों की कहानी उनकी जुबानी

चन्द्र सिंह रावत “स्वतंत्र” (इंदिरापुरम)



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1 जून 2022 को मैं, उनके गांव तल्ला ग्वालीगांव में पूर्व सभापति चंद्र सिंह रावत जी के निज निवास पर उनकी पूजनीया माता जी के अवसान होने पर शोकाकुल परिवार को शोक संवेदना प्रगट करने हेतु गया। मेरे साथ छोटे भाई राजे सिंह चौधरी भी थे। 

बातों बातों में चर्चा हुई कि गांव में 102 साल के बूबू जी भी हैं। तब मैंने सोचा कि उस इंसान को अवश्य मिलकर चलना चाहिए। हम दोनों रास्ता पूछते पूछते उनके घर आ गए। वह घर पर बैठे हुए थे। तंबाकू पी रहे थे। समय रहा होगा लगभग बारह सवा बारह दोपहर। आंखें कमजोर, कानों से भी कमतर सुनाई दे रहा था। आवाज में वह दम नहीं। भाई राजे सिंह ने मेरा और अपना परिचय दिया। तब वह कुछ आस्वस्त हुए।

परिचय पाकर वह कुछ सजग हुए। उनके चेहरे पर एक आनंद की सी अनुभूति देखी। उन्होंने स्वयं बताया कि उनकी उमर एक  सौ एक एक सौ दो होगी। उन्होंने बताया कि वह अनपढ़ हैं। उन्होंने बताया कि बारह साल तक वह जयपुर में रहे। एक बनिये की नौकरी करते थे। वे बार बार कहते हैं कि भगवान का ही एहसान है और किसी का एहसान नहीं है। पिताजी के मरने के बाद वह गांव आ गए और फिर कभी परदेश का मुंह नहीं देखा। 35 से 40 बकरियां होती थी। बड़ी खेती जमीन थी। इसी से 2 लड़कों और 2 लड़कियो का विवाह किया। उन्होंने बताया कि 3 हल जमीन मल्ली सारी और 3 हल जमीन तल्ली सारी में थी अब सब छोड़ दी है। उन्होंने बताया कि इलाके भर में सबसे अधिक अनाज ग्वालीगांव और मल्ला भनेरिया में होता था। एक खेत में 12 प्रकार के अनाज पैदा किए जाते थे। वे ज्यादा नाम तो नहीं बता पाए किंतु जो उन्हें याद था वह मंडुवा, झंगोरा, कौणी, चीणा, भट्ट, मास, ओगल, गहत, ज्वार, तुअर, बाजरा, मक्का आदि।



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उन्होंने बताया कि वह ग्राम बगोई से 1 बोजी संतरे (जिसमें 200 दाने होते थे) 5 रुपये में लाते थे। उन दिनों 3 दिन रामनगर जाने में लगते थे और वापसी में 4 दिन लगते थे। 15 रुपए में एक बोजी संतरे रामनगर में बिकते थे। गांव से चलकर पहले दिन देवताखाल, दूसरे दिन मोहान और तीसरे दिन रामनगर पहुंचते थे। रास्ते के लिए एक आदमी के लिए तीन नाली आटा ले जाते थे। गांव से सीली – जमरिया तक गांव के लोग सामान पहुंचाने जाते थे। उन दिनों रामनगर में 15 आने की एक भेली (गुड़ का बड़ा टुकड़ा गोलाकार में) मिलती थी। एक आदमी एक बार में 15 से 16 भेली लाता था। ढाई किलो की एक भेली होती थी। एक भेली को रास्ते में ही खा जाते थे। उससे परसाद (हलुवा) बनाते थे। साल भर के लिए गुड़, नूण (नमक) और कपड़ा लाते थे।

ये बताते समय उनकी आंखों में आनंदित कर देने वाली चमक और जिह्वा पर तेजी आ गई। आज के गांवों की स्थिति पर उन्होंने कहा कि ऐसा भी कोई समय आएगा उन्हें नहीं मालूम था। उन्होंने अपनी चमकती आंखों से हमें बताया कि एक दिन फिर से हमारे गांव आबाद होंगे तब हमने उन्हें निराश नहीं किया और कहा कि अवश्य आपके सपने पूरे होंगे। फिर एक दिन पहाड़ आबाद होंगे।







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