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New Delhi : हाल ही में सोशल मीडिया में एक मैसेज वायरल हो रहा था, कि चुनाव आयोग के निर्णय के अनुसार आगामी लोकसभा चुनाव 2024 में मतदान न करने वाले मतदाताओं के खाते में से स्वतः 350 रुपए जुर्माने के तौर पर काट लिए जाएंगे । इस वायरल मैसेज ने मुझ सहित अनेक जागरूक लोगों को चुनाव आयोग की अनिवार्य मतदाता की दिशा में शानदार पहल के संदर्भ में अवश्य आकर्षित किया होगा । वायरल मैसेज की जांच -पड़ताल करने पर पता चला कि मैसेज महज होली का मजाक था। चुनाव आयोग द्वारा ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया गया है।
भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले लोकतांत्रिक देश में अलग-अलग स्तरों पर शांतिपूर्ण व लोकतांत्रिक ढंग से मतदान की प्रक्रिया को पूर्ण करना चुनाव आयोग के लिए चुनौती है और इस उत्तरदायित्व के निर्वहन में चुनाव आयोग ने सकारात्मक व सराहनीय कार्य किया है। साल दर साल चुनाव सुधारो के दृष्टिकोण से चुनाव आयोग द्वारा लिए गए विभिन्न निर्णय देश के लोकतांत्रिक ढांचे की नींव को सुढड करने में सहायक सिद्ध हुए हैं । विश्व के 33 देशो में अनिवार्य मतदान की प्रक्रिया है। यहा मतदान ना करने की स्थिति में परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के दंड का प्रावधान है ।
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अनिवार्य मतदान देने वाले 33 देशो में अधिकांश देश विकसित हैं , जहां संवैधानिक मान्यताओं में सुढड आस्था के साथ नागरिकों में अधिकारों के प्रति सजगता, तो वही कर्तव्यो के प्रति परायणता भी समानांतर भाव से देखने को मिलती है । अनिवार्य मतदान का सकारात्मक पहलू है कि इससे बहुमत आधारित चुनाव व्यवस्था के प्रत्युत्तर में जो जनादेश आता है वह स्पष्ट , वास्तविक , तार्किक तथा स्थायित्व लिए होता है । जन की तंत्र प्रक्रिया में स्पष्ट भागीदारी और अभिव्यक्ति होती है । यद्यपि पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग द्वारा किए गए प्रयासों व सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों के माध्यम से मतदान प्रतिशत में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है । 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत काफी बेहतर 67.11 रहा, जो लगभग कुल मतदाताओं का दो तिहाई है, परंतु एक तिहाई मतदाताओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी न होना मतदान के प्रति उदासीनता के साथ वास्तविक जनादेश पर भ्रम की स्थिति भी पैदा करती है । यानी एक तिहाई मतदाता मत का प्रयोग कर चुनाव के अंतिम निर्णय को पलट रखने की क्षमता रखते थे । भारत के गत निर्वाचनों का इतिहास देखा जाए तो दृष्टिगोचर होता है कि प्रत्याशी की विजय पराजय में एक मत का अंतर भी रहा है , जो वोट न देने वाले मतदाताओं के मतदान की स्थिति में जनादेश पर पड़ने वाला अंतिम प्रभाव का परिचायक है ।
गौरतलब है की अनिवार्य मतदान को 1893 में लागू करने वाला विश्व का पहला राष्ट्रीय बेल्जियम है, जो कि विकसित लोकतांत्रिक राष्ट्र है जहां मतदान न करने पर जुर्माने तक का प्रावधान है । इसी प्रकार बोलिविया में मत न देने पर 3 महीने का वेतन वापस करने का प्रावधान है । सिंगापुर में मतदान देने वाले व्यक्तियों से मताधिकार छीन लिया जाता है। इस दृष्टिकोण से भारत मे भी मतदान न करने वालो को अल्पावधि के लिए जुर्माने के तौर पर वंचित किया जा सकता है।
अनिवार्य मतदान की व्यवस्था वाले उपरोक्त सभी देश विकास के विभिन्न मानदंडों में शीर्ष पायदानो पर है।
भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही बिना किसी भेदभाव के व्यस्क मताधिकार के आधार पर 21 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को मताधिकार प्रदान करना लोकतांत्रिक ढांचे एवं नागरिक अधिकारों की गरिमा की दृष्टि से साहसिक कदम था, तो वही मतदान हेतु सरकारी अवकाश से लेकर अलग-अलग स्तरों पर सुविधा मुहैया कराने के बावजूद मत न देना लोकतंत्र के प्रति गैर जिम्मेदार व्यवहार के साथ राष्ट्रीय कर्तव्यो के प्रति अकर्मण्यता की भावना भी दर्शाता है ।
61 संविधान संशोधन द्वारा मतदान की आयु 21 से घटकर 18 वर्ष किए जाने का उद्देश्य लोकतंत्र के महापर्व में आधिकाधिक नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित किया जाना था।
भारत में वर्तमान में 90 करोड़ मतदाता है जिनसे तकनीक व प्रचार प्रसार के इस आधुनिक युग में राजनीतिक जागरूकता , सजगता के साथ भागीदारी की उम्मीद की जा सकती है , जिससे जनादेश स्पष्ट लोकतांत्रिक तथा समावेशी हो ।
चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक प्रत्याशियों से सहमति और नाराजगी होने पर मतदाताओ को नोटा का विकल्प दिया जाना निर्वाचनो में नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने हेतु सकारात्मक कदम है।
लोकतंत्र के प्राण जनता में बसते हैं, और इसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति निर्वाचन है इसलिए अपने मत का महत्व और इस संदर्भ में युक्ति संगत निर्णय लोकतांत्रिक व्यवस्था को गतिमान बना रखने के लिए आवश्यक है।
बीना नयाल
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