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द्वारिका चमोली दिव्य पहाड़ :
उत्तराखंड प्रदेश अपने 25 वर्ष की यात्रा पर है। इस राज्य की परिकल्पना और अलग मांग के पीछे तीन मुख्य कारण थे। पहला रोजगार दूसरा शिक्षा और तीसरा स्वास्थ्य व हमारी पहचान। अब सवाल ये है कि इन 25 वर्षों में हमने क्या पाया? क्या किया ? इस पर विचार करने की किसी की भी मंशा नहीं है। न नेता, न जनता और नहीं सरकार की। सब अपने में रंगमत हो रखे हैं। शहीदों का बलिदान और जनता का त्याग कितना सफल हुआ कितना सुफल रहा ये विचारणीय विषय है, लेकिन इस 25 साल के जश्न को देखकर लग रहा है कि सब कुछ ठीक है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सब ठीक ही तो चल रहे हैं। तभी तो जगह जगह उत्सव और गीत संगीत की महफ़िल सज रही है। सरकार से लेकर जनता तक सभी इसमें रंगमत है। अगर कहीं चिंतन होता, विचार होता तो कहीं न कहीं तो आंदोलन की आग बची रहती।
प्रदेश में रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य की क्या बात करें, ये सब लोग जानते हैं। परंतु सबसे अहम् विषय तो हमारी पहचान का है उस पर हर तरफ से हमला हो रहा है। लेकिन इस बात को हम लोग समझना ही नहीं चाहते। अगर ऐसा होता तो जरूर कोई न कोई इसके लिए आगे आता। पहचान से मेरा मतलव हमारी भाषा, साहित्य और सस्कृति, रीती-रिवाज मुख्य हैं। लेकिन आज अगर हम उत्तराखंड खासकर पहाड़ की बात करें तो हम हर क्षेत्र में रोज कुछ न कुछ खो ही रहे हैं। यहां से हो रहे पलायन, बंजर होते खेत और बदलते परिवेश के कारण हमारे रीती-रिवाज भी प्रभावित हो रहे हैं।
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बात भाषा-साहित्य की करें तो इसके लिए कोई अच्छा माहौल दिखाई नहीं देता। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में गढ़वाली, कुमाउनी भाषा में बात करने वाले धीरे धीरे करके कम हो रहे हैं। दूसरी ओर राज्य बनने के बाद हमारी सरकारों ने भी गढ़वाली कुमाउनी भाषाओं के लिए कोई खास पहल नहीं की। पहल तो छोडो अब सरकारी आयोजनों में गढ़वाली, कुमाउनी की बात भी नहीं कर रहे हैं,कि कहीं वोट बैंक नाराज न हो जाए। हम स्वनामधन्य विद्वान, भाषाविद और साहित्यकार जो भाषा के पक्ष में अपनी सुविधानुसार बात-चीत करते हैं जो कि बहुत ही अफ़सोस की बात है। पता नहीं किस लालच में सब जान बूझकर भी चुप हैं, और सत्ता के गलियारे में ठुमके लगा रहे है। कि जिस राज्य में हजार साल से पुराणी भाषाओँ के नाम लेना भी खतरे से खाली नहीं, वहां उन भाषाओं की अकादमी को किसने और क्यों बचाना। यही कारण है की उत्तराखंड में उर्दू, पंजाबी, संस्कृत समेत कई भाषाओं की अकादमी फल-फूल रही है लेकिन अपनी गढ़वाली, कुमाउनी भाषा को कहीं जगह नहीं। विद्वान बोल रहे हैं की सरकार ने लोकभाषा समिति बनाई हुई है पर लग रहा है कि समिति को अभी तक कोई बजट नहीं प्राप्त हुआ, नहीं तो कोई न कोई हलचल जरूर दिखती।
लेकिन क्या बोलें, किसको बोलें यहां कोई सुनने वाला नहीं। हमारे भाग्यविधातों ने 25 साल गुजरने के बाद भी गढ़वाली, कुमाउनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने के लिए उत्तराखंड विधानसभा से अभी तक एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को नहीं भेजा। जबकि साहित्यकार व शिक्षाविद लगातार उनसे इसके लिए गुजारिश करते रहे हैं पर मजाल उन पर कोई जूं तक रेंग रही हो।
अभी हर किसी को ये सवाल गौण लग सकता है लेकिन कल को यही सवाल सबके सामने खड़ा होगा। तब इन सत्ताओं से और इस दौर के भाषाई सरोकारों से जुड़े व्यक्तियों से हम जवाब मांगेंगे, ये कान खोल कर सुन लें। ये बात ध्यान रख लें कि एक न एक दिन गढ़वाली, कुमाउनी भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में जरूर शामिल होंगी, चाहे आप कितने भी षड़यंत्र रचा लें, रास्ते बंद कर लें, रोड़े अटका लें। उस दिन तुम्हारी भी पहचान होगी, तुम्हारा भी इतिहास कोई न कोई ईमानदारी से लिखेगा। क्योंकि तुम्हारा गणित और विधाता का गणित अलग है।
पच्चीस साल का नौजवान उत्तराखंड सच्ची रहेगा भ्रम में, सच्ची रहेगा अबोध। एक न एक दिन वो अपने हक़ के विकास का हिसाब मांगेगा। अपनी भाषा साहित्य एवं संस्कृति का हिसाब मांगेगा। उस क्या जवाब दोगे ? कैसे दोगे ? पर जवाब तो तुमको देना पड़ेगा ? यूं चुपचाप अपनी मनमर्जी कब तक करते रहोगे ?
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