हिंदी की आवाज को उजागर करती कविताक्योंकि में हिंदी हूँ

में भारत की राष्ट्र भाषा हूँ
पर फाइलों में लिपटी धूल में पड़ी हूँ
न कोई पूछने वाला न कोई देखने वाला
क्योंकि में आम लोगों की भाषा हूँ
उच्च सोसाइटी में बन गयी तमाशा हूँ
कान्वेंट स्कूलों में तोड़ी मरोड़ी गयी
सरकारी कार्यालयों तक में तिरस्कृत की गयी
पर अपने वज़ूद को पाने के लिए अब तक खड़ी हूँ
क्योंकि में हिंदी हूँ, क्योंकि में हिंदी हूँ

सालों से वर्ष में एक बार
मुझको याद किया जाता है
बैनरों से मुझको लीपा पोता जाता है
मेरे नाम से जन्म लेती है कई योजनाएं
की जाती है मेरे उद्धार की कई घोषणाएं
पर फिर दरकिनार कर फेंक दी जाती हूँ
पर मैंने भी हिम्मत नहीं हारी
क्योंकि बहुतों के दिल में
अभी भी अपने को पाती हूँ
उन्ही के सहारे अब तक खड़ी हूँ
क्योंकि में हिंदी हूँ, क्योंकि में हिंदी हूँ
अब तक कैद की जिंदगी जी रही थी में
पर अब किसी कोने से निकल भ्रमण पर निकली हूँ
कुछ आज़ादी की जिंदगी का लुफ्त उठा रही हूँ
कुछ के दिलों की गांठ खोलने पे लगी हूँ
लोग मुझसे मिलकर ख़ुशी का अनुभव कर रहे है
देश तो क्या विदेशों में भी लोग
मुझे गले लगा रहे है
सरकारी तंत्र भी मुझे अपनाने लगा है
वो भी अपनी जड़ो से जुड़ने लगा है
आम बोल चाल की भाषा अब
खास होने जा रही है
अब जाकर लग रहा है कि में
देश के माथे की बिंदी हूँ
क्योंकि में हिंदी हूँ, क्योंकि में हिंदी हूँ
©DWARIKA CHAMOLI

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