उत्तराखंड के शिल्प और शिल्पकारों को सम्मान दे अपनी संस्कृति 

को दें बढ़ावा 

दिव्य पहाड़/द्वारिका चमोली 

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है इस कारण यहाँ की संस्कृति में देवतुल्य कार्य कूट कूट कर भरे हुए है। यहां सभी धर्म-जाती  के लोग एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य करते आ रहे हैं । यहां एक पिछड़ी जाती है जिन्हें औजी, ढोली, बाजगी, दास इत्यादि नामो से जाना जाता है। औजियों के बिना कोई कार्य संभव ही नहीं, कहा जाय तो ये पहाड़ की रीड हैं। किंतु हुनर होने के बाद भी इनका जीवन स्तर निम्न दर्जे का ही रहा इसका कारण यही कि उच्च जातीय लोगों ने इन्हें सदा दबाने का प्रयास ही किया। जबकि जन्म से लेकर मृत्यु तक इनके सहयोग की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। 

उत्तराखंड के कैलेंडर के हिसाब से महीने की शुरुआत संक्रांति से आरम्भ होती है। पहले यहां के गांवों में इस दिन औजी सुबह सुबह ढोल दमाऊं की थाप से घर घर जाकर लोगों को संग्रान का दिन होने के सूचना देते थे इसके बदले लोग उन्हें डडवार (दक्षिणा) में अनाज के रूप में गेंहू,चांवल, दाल, नमक़ इत्यादि वस्तुवें देते थे।


यही नहीं कोई भी शुभ कार्य हो तो गांव के औजी द्वारा ढोल बजाकर ही उसका शुभारंभ होता  है। इतिहास के अनुसार इन्हे शिवगण भी माना गया है। एक क्विदंती है कि ढोल की उत्पति शिव के डमरू से हुई है और जब माता पार्वती को इसका पता चला तो उन्होंने शिव से ढोल सागर के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की। कहते हैं जब शिव जी माता पार्वती को ढोल सागर ज्ञान के विषय में बता रहे थे तो वहां खड़े एक गण ने इसे कंठस्थ कर लिया था और उसके बाद ये परंपरा मौखिक रूप से उस गण की पीढ़ी करती चली आ रही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक और घर से लेकर जंगल तक ढोल दमाऊं के साथ साथ औजी भी चलते हैं। हर मांगलिक कार्य में ढोल की अलग अलग ताल होती है जिसे ढोल का ज्ञाता ही जान पाता है। हर कार्य में अलग अलग बृद्ध (मंत्र) गाये जाते हैं जो इन ओझियों को कंठस्थ होते हैं। यही नहीं उत्तराखंड के हस्तशिल्पी भी यही होते थे। अब चाहे वो भंडारण में उपयोग होने वाले उपकरण, रसोईं में उपयोग होने वाले उपकरण, कृषि में प्रयोग किए जाने वाले उपकरण हों या फिर काष्ठ कला हो सभी कार्यों की बेहतरीन शिल्पकारी इन्ही के द्वारा की जाती थी। 

किन्तु समय के साथ लोगों ने प्रवास में रहना जब से शुरू किया इनका पारंपरिक कार्य भी इनसे छिन सा गया है। नई पीढ़ी का इस ओर कोई रुझान नहीं है जिस वजह से इन शिल्पकारों को अपने जीवन के लिए एक गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है।


आज के समय लोग आधुनिकता के रंग में रंग कर मांगलिक कार्यों में पश्चिमी वाद्ययंत्रों को ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं जबकि उनको बजाने वालों को इसका रत्ती भर भी ज्ञान नहीं जिसकी वजह से ढोल सागर के जानकारों की अपेक्षा हो रही है। यही कारण है कि औजी सामाज की आजीविका प्रभावित हो रही है और ये लोग सामाजिक तिरस्कार और गिरती आर्थिक स्थिति के चलते अपने पारंपरिक कार्य को छोड़कर या तो पलायन कर रहे हैं या फिर दूसरे कार्यों को अपना रहे हैं। 

औजी समाज के तिरस्कार का असर उत्तराखंड संस्कृति पर भी पड़ रहा है। पहले शादी विवाह में 2-3 दिन लगा करते थे और औजी की भूमिका सभी दिन होती थी। बारात के दिन, वर पक्ष और बहु पक्ष के अपने अपने औजी होते थे जिनके द्वारा रात में नौबत लगाई जाती थी  (नौबत एक प्रकार की ताल ) जो विवाह समारोह में चार चाँद लगा देते थे। किंतु अब तो विवाह की रीत भी बदल गई है और विवाह समारोह में भी ढोल दमाऊ और मसक बाजे की जगह बैंड बाजों ने ले ली है। 

देखा जाए तो अब स्थिति बदली है और शिल्पकार भी समाज की मुख्यधारा में जगह बना रहे है किंतु अभी भी स्थिति पूर्ण रूप से ठीक नहीं हुई है। उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए ही सरकार ने इनके द्वारा रखी ढोल आर्केस्ट्रा को उद्योग का दर्जा देने की मांग स्वीकार कर ली है और प्रदेश के विभिन्न शिल्पों को स्वरोजगार से जोड़ने का काम भी तीव्रगति से चल रहा है।


हम सब को ध्यान देना होगा की हमे अपने उत्तराखंड की पहचान को बचाये रखना है | हम सब को भी चाहिए कि उत्तराखंड की पहचान को बचाए रखने के लिए यहां के  पौराणिक वाद्ययंत्र, हस्तकला और उन्हें बजाने-बनाने वाले शिल्पकारों की रक्षा के लिए  बढ़ चढ़ कर कार्य करना होगा अन्यथा हम अपनी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा खो देंगे। क्योंकि संस्कृति और भाषा ही तो हमारी असली पहचान है। 














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