चमोली जिले की स्थापना दिवस पर आप सभी को बधाई 

गोपेश्वर : उत्तराखंड के तीन जिलों चमोली, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ की स्थापना आज ही के दिन 24 फ़रवरी 1960 को हुई थी। आज में आपको संक्षिप्त में चमोली जिले के विषय में बता रहा हूं।  जिला बनने से पूर्व चमोली पौड़ी जिले का हिस्सा हुआ करता था। जब इस जिले की स्थापना हुई तो रेशम निदेशालय, एसएसबी सेंटर, एएनएम प्रशिक्षण सेंटर, पशुपालन निदेशालय, भेड़ प्रजनन केंद्र, कांचुलाखर्क में कस्तुरा मृग प्रजनन केंद्र, भराड़ीसैंण में विदेशी पशु प्रजनन केंद्रों की स्थापना की गई थी। मगर राज्य बनते ही एक-एक कर सभी संस्थानों को मैदान भेज दिया गया| जिस कारण इस जिले में विकास की गति मध्यम पड़ गई जो आज तक जारी है। 

जिला बन जाने के बाद चमोली ने कई प्राकृतिक आपदाओं का दंश भी झेला है। सन् 1970  में बेलाकुची की बाढ़ ने ऐसी तबाही मचाई कि इस शहर का एक बहुत बड़ा हिस्सा अलकनंदा नदी में डूब गया था उसी का नतीजा है कि चमोली का जिला मुख्यालय गोपेश्वर में हस्तांतरित किया गया था। गोपेश्वर चमोली से लगभग 12 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव था।  सन 1974 में  यहां वनों को बचाने के लिए एक अतिमहत्वपूर्ण आंदोलन शुरू हुआ जिसे लोग चिपको आंदोलन के नाम से जानते हैं। 52  साल के इस लंबे सफर में चमोली जिले में आज भी सड़क, पानी, बिजली और स्वास्थ्य सेवाओं की दरकार है। कह सकते हैं कि विकास की राह में इसे अभी मीलों चलना है। 

चमोली का एक ऐतिहासिक इतिहास भी रहा है। 

महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान यहां निवास किया था जिसके प्रमाण भी मौजूद हैं। यहां चारधाम के साथ साथ पंचप्रयाग भी है तो फूलों की घाटी भी आपको आकर्षित करती दिखाई देगी। अपनी प्राकृतिक छटा एवं मनोरम दृश्यों के लिए प्रसिद्ध यह जिला पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचता है और सैकड़ों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहां आते हैं। दुर्योधन के सखा कर्ण ने भी यहां आकर कठोर तपस्या की थी और उन्ही के नाम से कर्णप्रयाग को जाना जाता है।


वहीं प्रथम विक्टोरिया क्रॉस स्व० दरवान सिंह जी का पैतृक गांव भी इसी जिले में है। उत्तराखंड राज्य बन जाने के बाद उसकी स्थाई राजधानी गैरसैण भी इसी जिले में है और यहां विधानसभा भवन भी तैयार है साथ ही ग्रीष्मकालीन राजधानी के चलते यह जिला ज्यादा सुर्ख़ियों में आया। 

चमोली जिला अपनी स्थापना दिवस को धूमधाम से मनाता आया था। लेकिन लगता है अब स्थापना दिवस को भी भुला दिया गया है। इसीलिए तो इस दिन सरकारी कार्यक्रमों के आयोजन की जहमत तक नहीं उठाई जाती ।

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