अमेस (Hippophae)-उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला

बहुत ही गुणकारी फल 

आप सभी जानते होंगे कि उत्तराखंड के जंगलों में ऐसे अनेकों फल हैं जो हमारे स्वास्थ्य को दुरस्त रखने में अहम् भूमिका निभाने के साथ साथ हमारी किस्मत बदलकर मालामाल कर सकते हैं। ये जंगली फल वहां के लोकगीतों और लोक संस्कृति में रचे बसे हैं लेकिन गुणों से भरपूर इन फलों को वो महत्त्व नहीं मिल पाया जिसकी इन्हे दरकार थी। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद सरकारों ने आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए जड़ी बूटियों को रोज़गारोपुरक बनाने के लिए खूब शोर शराबा तो किया किंतु इन फलों पर किसी ने भी गौर नहीं किया और ये केवल लोक गीतों में ही सिमट कर रह गए। इन जंगली फलों में  एंटी ऑक्सीडेंट और विटामिन की भरपूर मात्रा मिलती है।

अमेस फल जिसमें विटामिन की है भरपूर मात्रा 

उत्तराखंड में पाया जाने वाला अमेस फल जिसका वानस्पतिक नाम हिप्पोफी (Hippophae) है । यह काफी गुणकारी होता है और औषधीय गुणों से भरपूर होता हैं। इसे पहले केवल वनस्पती ही समझा जाता था। लेकिन जड़ी बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर के वैज्ञानिकों ने इसका औषधीय गुण पहचाना। उन्होंने इस पर कई शोध कर इसकी पौध को अपने संस्थान में तैयार किया और उसके गुणों को परखने के बाद लोगों को इससे होने वाले लाभ से अवगत  कराया।  विटामिन की भरपूर मात्रा होने की वजह से कुछ देश अमेस फल से  स्पोर्ट्स ड्रिंक बनाने लगे हैं और जो काफी पसंद भी किया जाने लगा है। इसके साथ ही इसका मार्किट में भाव भी कई गुना अधिक हो गया है। उत्तराखंड में अमेस फल की दो प्रजातियां मिलती हैं। समुद्र तल से करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिले में यह फल बहुतायत में पाया जाता है ।

इसका पेड़ जमीन से तीन से सात फीट तक ऊंचा होता है जिसकी टहनिया पतली  और घनी पत्तियां लिए होता है । इन घनी पतियों के बीच फल एक जंगली बेर की तरह नज़र आता है। पकने पर यह नारंगी और लाल रंग का हो जाता है। वैज्ञानिको के अनुसार इसमें एंटी कैंसर तत्व भी मिलते है जिसे देखते हुए इसका औषधीय महत्त्व काफी बढ़ जाता है। 

अमेस के महत्त्व को जानकार अब उत्तराखंड प्रदेश के उद्यान विभाग ने जड़ी बूटी शोध संस्थान के साथ मिलकर इसके प्रसंस्करण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जिसके तहत उत्तरकाशी जिले के नौगांव समेत चमोली व पिथौरागढ़ जिले में महिला समूहों को इस काम से जोड़ा है। ग्रामीणों को प्रशिक्षण देकर इससे पांच तरह के उत्पाद तैयार कराये जा रहे हैं। 

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