प्रकृति के चितेरे कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थेप्रकृति के चितेरे कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे

प्रकृति के सुकुमार कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे

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दिनेश ध्यानी

प्रकृति के चितेरे कवि, हिमवंत पुत्र चन्द्र कुंवर बर्त्वाल का जन्म उत्तराखण्ड के चमोली जिले के ग्राम मालकोटी, पट्टी तल्ला नागपुर में 20 अगस्त 1919 में हुआ था। बर्त्वाल जी की शिक्षा पौड़ी, देहरादून और इलाहाबाद में हुई तथा 1939 में इन्होने इलाहाबाद से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1941 में एम०ए० में लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। यहीं पर ये श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ जी के सम्पर्क में आये।
इस छोटी सी उम्र में भी वह देश-दुनिया को सुंदर साहित्य दे गए. चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताएं मानवता को समर्पित थीं. बेशक वह प्रकृति के कवि पहले थे. बर्त्वाल हिंदी साहित्य के एक मात्र ऐसे कवि थे जिन्होंने हिमालय, प्रकृति व पर्यावरण के साथ-साथ मनुष्य की सुंदर भावनाओं और संवेदनाओं को अपनी कविताओं में पिरोया. उनकी कविताएं हिमालय व प्रकृति प्रेम की साक्षी रही हैं। अल्पायु में ही उन्होंने हिंदी में एक हजार अनमोल कविताएं, 24 कहानियां, एकांकी और बाल साहित्य का अनमोल खजाना हिंदी साहित्य को दिया. मृत्यु पर आत्मीय ढंग और विस्तार से लिखने वाले चंद्र कुंवर बर्त्वाल हिंदी के पहले कवि हैं.

1939 में ही इनकी कवितायें “कर्मभूमि” साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित होने लगी थी, इनके कुछ फुटकर निबन्धों का संग्रह “नागिनी” इनके सहपाठी श्री शम्भूप्रसाद बहुगुणा जी ने प्रकाशित कराया। बहुगुणा जी ने ही 1945 में “हिमवन्त का एक कवि” नाम से इनकी काव्य प्रतिभा पर एक पुस्तक भी प्रकाशित की। इनके काफल पाको गीति काव्य को हिन्दी के श्रेष्ठ गीति के रूप में “प्रेमी अभिनन्दन ग्रन्थ” में स्थान दिया गया। इनकी मृत्यु के बाद बहुगुणा जी के सम्पादकत्व में “नंदिनी” गीति कविता प्रकाशित हुई, इसके बाद इनके गीत- माधवी, प्रणयिनी, पयस्विनि, जीतू, कंकड-पत्थर आदि नाम से प्रकाशित हुये। नंदिनी गीत कविता के संबंध में आचार्य भारतीय और भावनगर के श्री हरिशंकर मूलानी लिखते हैं कि “रस, भाव, चमत्कृति, अन्तर्द्वन्द की अभिव्यंजना, भाव शवलता, व्यवहारिकता आदि दृष्टियों से नंदिनी अत्युत्तम है। इसका हर चरण सुन्दर, शीतल, सरल, शान्त और दर्द से भरा हुआ है।

चंद्र कुंवर कालिदास को मानते थे। उनका कहना था कि-


मैं न चाहता युग-युग तक पृथ्वी पर जीना,
पर उतना जी लूं जितना जीना सुंदर हो.
मैं न चाहता जीवन भर मधुरस ही पीना,
पर उतना पी लूं जिससे मधुमय अंतर हो।

ये पंक्तियां हैं हिंदी के कालिदास के रूप में जाने माने प्रकृति के चहेते कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की। बहुत कम लोगों को पता होगा की जीवन में असाध्य रोग से पीड़ित रहने के बाद भी उन्होंने साहित्य सेवा का साथ-साथ चमोली के पोखरी और रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि में अध्यापन भी किया था। आज उनके साहित्य पर कई छात्र पीएचडी कर रहे हैं। लेकिन अफ़सोस इस बात का है कि उत्तराखण्ड के सुदूर गांव का या राष्ट्रीय कवि आज भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान से महरूम है।

चंद्र कुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कविता संग्रह और रचनाओं में प्रमुख हैं गीत संग्रह: गीत माधवी, पयस्विनी, प्रेमिनी, जीतू, कंकड़-पत्थर, और नंदिनी
प्रमुख कविताएं: पयस्विनी, पाँवलिया, अल्लाह की जुबान, मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं, घर की याद, बसंत आगमन, और स्वर्ग सरि। इसके अलावा बहुत सा साहित्य उनकी मृत्यु के बाद उनके सामान के साथ ही जला दिया गया था। क्योंकि टीबी की बीमारी का भय इतना था कि मरीज के कपड़ों, बर्तनों आदि किसी भी सामान को नहीं छूते थे। लोग डरते थे कि कहीं यह बीमारी हमें न हो जाये इसलिए चंद्र कुंवर बर्त्वाल के देहांत के बाद उनका अधिकांश सामान जला दिए गया। जिसमे उनका रचना संसार का एक अहम् हिस्सा स्वाहा हो गया। फिर भी उनके जाने के बाद बहुत कुछ साहित्य दुनियां के सामने आ पाया। चंद्र कुंवर बर्त्वाल की मृत्यु के बाद उनके सहपाठी शंभुप्रसाद बहुगुणा ने उनकी रचनाओं को प्रकाशित करवाया और यह दुनिया के सामने आईं. इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि आज भी हिंदी साहित्य के अनमोल रत्न कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल को राष्ट्रीय स्तर पर वो सम्मान प्राप्त नहीं हो सका है, जिसके वह हकदार थे।

चंद्र कुंवर बर्त्वाल की प्रमुख कविताओं में विराट ज्योति, कंकड़-पत्थर, पयस्विनी, काफल पाकू, जीतू, मेघ नंदिनी हैं। युवावस्था में ही वह टीबी के शिकार हो गए थे। इसके चलते उन्हें पांवलिया के जंगल में बने घर में एकाकी जीवन व्यतीत करना पड़ा था। उस ज़माने में टीबी का नाम सुनकर ही लोग डर जाते थे। इसलिए बीमार को घर-गांव से दूर कहीं एकांत में रख देते थे। ताकि यह असाध्य बीमारी किसी अन्य को न हों। चंद्र कुंवर बर्त्वाल के साथ भी यही हुआ उनको उनके घर वालों ने गांव से दूर पंवालिया में अपनी एक गौशाला में रख दिया गया। घर के लोग सुबह-शाम को उनके लिए दरवाजे पर भोजन रख आते थे और बाकी दिन-रात चंद्र कुंवर एकांत में अपनी मौत को धीरे-धीरे उनके करीब आता महसूस करते थे। इस दशा में उन्होंने अपने को टूटने नहीं दिया। वे दुरूह बीमारी में भी खाट पर पड़े-पड़े और बैठे-बैठे खिड़की से सुदूर प्रकृति के नजारों को निहारते रहते और मौत सहित प्रकृति पर कवितायेँ रचते रहते। उनकी तन्हाई और कागज कलम ही उनका साथी थे। मृत्यु शय्या पर पड़े हुए के युवा जिसे पता है आज नहीं तो कल उसे मारना ही है। वह तिल-तिल कर मर रहा था लेकिन फिर भी कुछ रच रहा था, कुछ लिख रहा था।

मृत्यु के सामने खड़े कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल मात्र 28 साल की जीवन यात्रा में हिन्दी साहित्य की अपूर्व सेवा कर 14 सितंबर, 1947 को अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गये। वह रविवार का दिन था जब चंद्र कुंवर अपने पीछे अपनी अव्यवस्थित काव्य संपदा को यह कह कर छोड गयेः-

मैं सभी के करूण-स्वर हूॅ सुन चुका
हाय मेरी वेदना को पर न कोई गा सका।

अधिकांश समीक्षक चंद्र कुंवर बर्त्वाल को हिंदी का कालिदास मानते हैं परन्तु हिंदी के इस हिमवंत कवि बर्त्वाल ने सत्तर साल पहले रचित अपनी ‘छुरी’ नामक कविता मेे जिस परिदृश्य को खींचा था उसे उनकी दूरदर्शिता कहेंगे या मात्र संयोग इसका निर्णय आप स्वयं उस कविता के निम्न अंश को देखकर कर सकते हैे:-

मजदूरों की सरकार ओह
इटली तू जाय जहन्नम को,
लीग सी नाज्री जो छोडी
नामर्द कहें क्या हम तुम को।

पहाड़ में जन्में और पले-बढे चंद्र कुंवर को पहाड़ों से विशेष प्रेम था। कल-कल करती नदियां, सामने अडिग पहाड़ और प्रकृति की अद्धभुत छठा उनके मानस पर सदा ही गहरा प्रभाव बनाये हुई थी तभी तो पहाड़ के लिए उनकी कविता में वे कहते हैं कि –

मुझको पहाड़ ही प्यारे है
प्यारे समुंद्र मैदान जिन्हें
नित रहे उन्हें वही प्यारे
मुझ को हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे है।

पावों पर बहती है नदिया
करती सुतीक्षण गर्जन धवानिया
माथे के ऊपर चमक रहे
नभ के चमकीले तारे है
आते जब प्रिय मधु ऋतु के दिन
गलने लगता सब और तुहिन
उज्ज्वल आशा से भर आते
तब क्रशतन झरने सारे है।

इसके अलावा जब उनको लगा कि अब मृत्यु नजदीक ही है तो उन्होंने अपनी कलम से इन शब्दों के माध्यम से अपने भाव प्रकट करे :-

विदा-विदा हे हरित तृणों की सुन्दर धरती ।
विदा-विदा हे मानव पशु की पूजित जननी
विदा हृदय के सुख चिर विदा प्राण-प्रिय यौवन ।

इस प्रकार से हिंदी साहित्य संसार का यह विरला कवि जीवन में 28 वसंत देखने के बाद, असाध्य पीड़ा को आत्मसात करने के बाद इस संसार से विदा हो गया और अपने पीछे छोड़ गया अपना अद्वितीय अद्भुत साहित्य संसार।

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