Garhwali Kumaoni Jaunsari Academy Delhi ke karyakram me vichar vyakt karte vaktaस्वतंत्रता दिवस ( Independence day) के उपलक्ष्य में एक सार्थक, साहित्यिक गोष्ठी संपन्न

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में एक सार्थक, साहित्यिक गोष्ठी संपन्न

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डॉ. हेमा उनियाल

नई दिल्ली : 19 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस ( Independence day) के अवसर पर संस्कृत अकादमी सभागार, झंडेवालान, दिल्ली में गढ़वाली, कुमाऊनी एवं जौनसारी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित “संगोष्ठी एवं कवि सम्मेलन” में सम्मिलित होने का सुखद अवसर मिला।

कार्यक्रम का प्रथम सत्र का विषय

“स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान” जैसे महत्वपूर्ण विषय को समर्पित था

द्वितीय सत्र का विषय

उत्तराखंड के युवा और राष्ट्र निर्माण : स्वतंत्रता के अमृत विचार से विकसित भारत तक।”

द्वितीय सत्र में मुझे भी अपने विचार रखने का अवसर प्राप्त हुआ। उत्तराखंड की युवा शक्ति, उसकी सांस्कृतिक चेतना, मातृभूमि के प्रति समर्पण और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका जैसे विषयों पर विचार-विमर्श ने मन को गहराई से स्पर्श किया।

इस अवसर पर अनेक साहित्यकारों, कवियों और संस्कृति-प्रेमियों से आत्मीय भेंट हुई। लंबे समय बाद साहित्य और संस्कृति के अपने साथियों के बीच बैठना अपने आप में एक सुखद अनुभव रहा। संवाद, विचार और कविता से सजा यह आयोजन निश्चित रूप से स्मरणीय रहा।

ऐसे आयोजन केवल कार्यक्रम नहीं होते, वे अपनी जड़ों, अपनी भाषा और अपनी सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ने के अवसर भी होते हैं।

“स्वतंत्रता के अमृत विचार से विकसित भारत तक”—यह केवल किसी संगोष्ठी का विषय नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में भारत की यात्रा और उसके भविष्य की दिशा पर विचार करने का एक व्यापक अवसर रहा।

प्रथम सत्र में “स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तराखंड का योगदान” विषय पर, उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रीय आंदोलन में प्रदेश की भूमिका पर केंद्रित इस सत्र ने इतिहास के उन पन्नों को स्मरण करने का अवसर दिया, जिनमें हिमालयी अंचल के लोगों के त्याग, साहस और राष्ट्रभक्ति की अनेक गाथाएं दर्ज हैं।

द्वितीय सत्र का विषय था “उत्तराखंड के युवा और राष्ट्र निर्माण : स्वतंत्रता के अमृत विचार से विकसित भारत तक।” यह विषय विशेष रूप से वर्तमान समय की आवश्यकताओं से जुड़ा हुआ था। स्वतंत्रता केवल अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के दायित्वों और भविष्य के संकल्पों का भी नाम है। उत्तराखंड के युवा अपनी प्रतिभा, परिश्रम, नवाचार, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक चेतना के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में किस प्रकार प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं,इस पर विचार-विमर्श हुआ।

इस द्वितीय सत्र में मुझे भी अपने विचार रखने का अवसर मिला। मेरे लिए यह केवल मंच पर वक्तव्य देने का अवसर नहीं था, बल्कि उत्तराखंड की युवा शक्ति, उसकी सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्र के व्यापक भविष्य के साथ अपने विचारों को जोड़ने का एक आत्मीय अनुभव था।

कार्यक्रम में अनेक साहित्यकारों, कवियों और संस्कृति-प्रेमियों की उपस्थिति ने वातावरण को और अधिक जीवंत बना दिया। आत्मीय मुलाकातें, विचारों का आदान-प्रदान और साहित्यिक संवाद इस आयोजन की विशेष उपलब्धि रहे।

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष में कवि सम्मेलन ने कार्यक्रम को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। कविता जब अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपने पहाड़ और अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ती है, तब वह केवल अभिव्यक्ति नहीं रहती,वह सामूहिक संवेदना की आवाज बन जाती है। इस दृष्टि से यह आयोजन उत्तराखंड की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को दिल्ली जैसे महानगर में जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण प्रयास भी था।

इस सुंदर आयोजन के लिए गढ़वाली, कुमाऊँनी एवं जौनसारी अकादमी, दिल्ली सरकार के प्रति हृदय से आभार। अकादमी ने जिस आत्मीयता और प्रतिबद्धता के साथ भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज को जोड़ने का यह प्रयास किया, वह निश्चित रूप से प्रशंसनीय है।

ऐसे आयोजन हमें यह स्मरण कराते हैं कि विकास की यात्रा अपनी जड़ों से कटकर नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को साथ लेकर ही सार्थक बनती है। स्वतंत्रता के अमृत विचार से विकसित भारत की ओर बढ़ते हुए उत्तराखंड के युवाओं की ऊर्जा, प्रतिभा और संवेदनशीलता देश की अमूल्य शक्ति बन सकती है।

“स्वतंत्रता के अमृत विचार से विकसित भारत तक” यह केवल एक कालखंड की चर्चा नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता-यात्रा से उसके भविष्य के संकल्प तक पहुँचने वाली एक सतत राष्ट्रीय चेतना का नाम है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूर्ण होने के पश्चात 2022 से 2047 तक की अवधि को अमृतकाल के रूप में देखने का विचार सामने आया। वर्ष 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी तक भारत को विकसित, आत्मनिर्भर, समृद्ध, सक्षम और विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखने वाला राष्ट्र बनाने का संकल्प इसी उद्देश्य को लेकर हुआ है।

ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस राष्ट्रीय यात्रा में उत्तराखंड का युवा क्या भूमिका निभा सकता है?

मेरे लिए इस प्रश्न का उत्तर उत्तराखंड की धरती, उसके इतिहास, उसकी संस्कृति और उसकी युवा चेतना में ही छिपी हुई दिखाई देती है।

उत्तराखंड की पहचान केवल हिमालय की ऊँची चोटियों, कल-कल बहती नदियों और देवभूमि की आध्यात्मिक परंपराओं से नहीं है। यह भूमि त्याग, साहस, राष्ट्रसेवा, सामाजिक जागरण और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की दीर्घ परंपरा की भूमि भी है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक इस प्रदेश के लोगों ने राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता अनेक रूपों में व्यक्त की है। सेना में सेवा से लेकर शिक्षा, प्रशासन, साहित्य, विज्ञान, खेल और सामाजिक जीवन तक उत्तराखंड की प्रतिभाओं ने देश को अपना योगदान दिया है।

इसलिए उत्तराखंड के युवा को केवल वर्तमान का युवा नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा का उत्तराधिकारी समझना होगा, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ना सीखा है।

हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें स्वतंत्र भारत दिया। उन्होंने अपने वर्तमान का त्याग इसलिए किया कि आने वाली पीढ़ियाँ स्वतंत्र वातावरण में अपने भविष्य का निर्माण कर सकें। आज की युवा पीढ़ी के सामने चुनौती यह है कि वह स्वतंत्रता के इन अमूल्य विचारों को बदलते समय की आवश्यकताओं से जोड़े और नई भारत विकास-गाथा लिखे।जिसमें स्वाभिमान,समानता,लोकतंत्र,सामाजिक न्याय,आत्मनिर्भरता और नागरिक कर्तव्य जीवित रहें।अमृतकाल का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब स्वतंत्रता की चेतना हमारे कर्म में दिखाई दे।

आज के युवा के सामने डिजिटल सेवाओं, आधुनिक विज्ञान, नवाचार, स्टार्टअप और उद्यमिता के नए द्वार खुले हैं। ज्ञान और तकनीक ने अवसरों की सीमाएँ बहुत विस्तृत कर दी हैं। उत्तराखंड का युवा यदि इन अवसरों को अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और संसाधनों से जोड़ सके, तो वह न केवल अपने लिए रोजगार का निर्माण कर सकता है, बल्कि अपने गाँव, अपने प्रदेश और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को भी नई शक्ति दे सकता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के लिए विकसित भारत का अर्थ क्या है?

विकसित भारत की चर्चा करते समय हमें यह भी समझना होगा कि भारत के प्रत्येक प्रदेश के लिए विकास का अर्थ एक जैसा नहीं हो सकता।

उत्तराखंड दो मंडलों और 13 जिलों वाला राज्य है और इसका बड़ा भूभाग पर्वतीय है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ मैदानी राज्यों से भिन्न हैं। एक ओर देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर जैसे क्षेत्रों में शिक्षा, उद्योग और सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ है, वहीं दूसरी ओर अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसर, कठिन भौगोलिक परिस्थितियाँ, आधारभूत सुविधाओं की चुनौतियाँ और पलायन जैसी समस्याएँ आज भी हमारे सामने हैं।

हमारे लिए विकसित भारत का अर्थ है, आबाद पहाड़, आत्मनिर्भर गाँव, कुशल युवा, सम्मानजनक रोजगार, सशक्त महिलाएँ, सुरक्षित सीमांत क्षेत्र और प्रकृति के साथ संतुलित विकास।

यदि पहाड़ के गाँव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार की तलाश में अपनी जड़ों से दूर जाने को विवश हैं और स्थानीय संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पा रहा है, तो केवल आर्थिक आँकड़ों में वृद्धि को पूर्ण विकास नहीं माना जा सकता।

विकास की सफलता का एक महत्वपूर्ण पैमाना यह भी होना चाहिए कि क्या हमारे गाँवों में जीवन की गुणवत्ता बेहतर हुई है? क्या युवा अपने प्रदेश में सम्मानजनक आजीविका प्राप्त कर सकता है? क्या महिलाओं को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बनाया जा रहा है? क्या हमारे जलस्रोत, जंगल और हिमालय सुरक्षित हैं?

यहीं से राष्ट्र निर्माण में उत्तराखंड के युवा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

युवा केवल रोजगार पाने वाला नहीं, रोजगार सृजित करने वाला बने। आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र मानक न माने। नौकरी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ-साथ रोजगार सृजन की संस्कृति विकसित करना भी आवश्यक है।

उत्तराखंड में कृषि, बागवानी, औषधीय पौधे, जैविक खेती, पशुपालन, मधुमक्खी पालन, खाद्य प्रसंस्करण, स्थानीय हस्तशिल्प, पर्यटन, होम-स्टे, साहसिक पर्यटन, डिजिटल सेवाएँ और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग जैसे अनेक क्षेत्र हैं, जिनमें युवा उद्यमिता की संभावनाएँ तलाश सकते हैं।

हमारे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का मिलन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पहाड़ के स्थानीय उत्पाद यदि आधुनिक पैकेजिंग, डिजिटल मार्केटिंग और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ें, तो वे केवल स्थानीय उपयोग की वस्तुएँ नहीं रहेंगे, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।यही वह स्थान है जहाँ स्टार्टअप और नवाचार जैसे आधुनिक शब्द उत्तराखंड की वास्तविक जीवन-स्थितियों से जुड़ते हैं।

हमें ऐसे स्टार्टअप की आवश्यकता है जो केवल महानगरों की समस्याओं का समाधान न करें, बल्कि पहाड़ की वास्तविक समस्याओं के समाधान खोजें,दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएँ कैसे पहुँचें, शिक्षा को डिजिटल माध्यम से कैसे बेहतर बनाया जाए, स्थानीय उत्पादों को बाजार कैसे मिले, जलस्रोतों का संरक्षण कैसे हो, पर्यटन को पर्यावरण-अनुकूल कैसे बनाया जाए और युवाओं को अपने गाँव से ही आय के अवसर कैसे मिलें।

पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती भी है। जब किसी गाँव से युवा पीढ़ी बाहर चली जाती है, तो केवल घर खाली नहीं होते, धीरे-धीरे स्थानीय परंपराएँ, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक निरंतरता भी प्रभावित होती है।

यदि गाँव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ, डिजिटल कनेक्टिविटी, परिवहन और सम्मानजनक आय के अवसर उपलब्ध हों, तो युवा अपने गाँव को छोड़ने के बजाय वहीं से भी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।

हमें ऐसी परिस्थितियाँ बनानी होंगी जहाँ पहाड़ छोड़ना मजबूरी न हो, बल्कि बाहर जाना केवल एक विकल्प हो।

युवा अपने गाँव में रहकर भी दुनिया से जुड़ सके,यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक है।

हिमालय केवल हमारी भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि हमारी जल-संपदा, जैव-विविधता, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक विरासत का आधार है। गंगा और उसकी सहायक नदियों का उद्गम, असंख्य जलस्रोतों की जीवनदायिनी भूमिका और वन-संपदा का महत्व केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है,इसका संबंध पूरे देश के भविष्य से है।

इसलिए हिमालय की रक्षा केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का विषय है।

आज हमें ऐसे युवा चाहिए जो पर्यटन भी विकसित करें और पर्यावरण भी बचाएँ,आधुनिक तकनीक भी अपनाएँ और हिमालय की संवेदनशीलता को भी समझें,सड़क और कनेक्टिविटी भी बढ़ाएँ और जल-जंगल-जमीन की रक्षा भी करें।

यदि हिमालयी पर्यावरण संरक्षण को रोजगार और उद्यमिता से जोड़ा जाए, तो यह चुनौती अवसर में बदल सकती है। स्थानीय युवाओं को प्रकृति-आधारित पर्यटन, जैव-विविधता संरक्षण, जल संरक्षण, प्राकृतिक खेती और पर्यावरणीय अनुसंधान जैसे क्षेत्रों से जोड़ा जा सकता है।

उत्तराखंड की युवा महिलाओं की भूमिका भी इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।पहाड़ की महिलाओं ने पीढ़ियों से परिवार, कृषि, पशुपालन और सामाजिक जीवन की जिम्मेदारियाँ संभाली हैं। आज उनकी ऊर्जा को शिक्षा, कौशल, उद्यमिता, स्वयं सहायता समूहों, स्थानीय उत्पादों और डिजिटल बाजारों से जोड़ा जाए तो वे न केवल परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं, बल्कि पूरे गाँव की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती हैं।

इसी प्रकार उत्तराखंड के सीमांत गाँवों का जीवंत और समृद्ध रहना केवल स्थानीय विकास का प्रश्न नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए सीमांत क्षेत्रों में युवाओं के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कनेक्टिविटी, रोजगार और उद्यमिता के अवसर बढ़ाना राष्ट्र निर्माण का ही हिस्सा है।

परिवर्तन की सबसे बड़ी कुंजी शिक्षा है.युवा शक्ति तभी राष्ट्र शक्ति बन सकती है जब उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सही दिशा मिले, जिस पर बहुत प्रयास अभी जरूरी हैं।

आज आवश्यकता शिक्षा को अगले स्तर तक ले जाने की है।शिक्षा केवल डिग्री देने वाली व्यवस्था न रहे, बल्कि उसमें कौशल, नवाचार, वैज्ञानिक दृष्टि, उद्यमिता, पर्यावरण चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व भी विकसित हो।

उत्तराखंड का युवा आधुनिक विज्ञान सीखे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक को समझे, लेकिन साथ ही अपने लोकज्ञान, लोकभाषा, लोककला और प्राकृतिक संसाधनों की महत्ता को भी पहचाने।आधुनिकता और परंपरा का यह संतुलन ही उत्तराखंड को विशिष्ट विकास मॉडल दे सकता है।

आज के समय में अधिकारों की चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन भी उतना ही आवश्यक है।

इसलिए उत्तराखंड के युवा को यह समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल किसी बड़े पद पर पहुँचकर नहीं किया जा सकता। एक शिक्षक ईमानदारी से शिक्षा देकर, वैज्ञानिक अनुसंधान करके, किसान आधुनिक तकनीक अपनाकर, उद्यमी रोजगार देकर, साहित्यकार समाज में चेतना जगाकर और एक सामान्य नागरिक अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करके राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकता है।

स्वतंत्रता की पीढ़ी ने हमें स्वतंत्र भारत दिया । अब हमारी पीढ़ी और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के सामने दायित्व है कि वह इस स्वतंत्र भारत को समर्थ, आत्मनिर्भर, समतामूलक, संवेदनशील और विकसित भारत बनाने में अपना योगदान दे।

मैं उत्तराखंड के युवाओं से कहना चाहती हूँ….

अपने पहाड़ को अपनी जन्मभूमि के साथ ही अपनी कर्मभूमि बनाने का साहस कीजिए।

अपनी शिक्षा को केवल रोजगार का साधन मत बनाइए, उसे समाज परिवर्तन का माध्यम बनाइए।

अपनी प्रतिभा को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित मत रखिए, उसे राष्ट्र की शक्ति बनाइए।

महत्वपूर्ण है कि आप केवल अपने भविष्य का निर्माण नहीं कर रहे हैं, आप अपने प्रदेश और अपने राष्ट्र के भविष्य का निर्माण कर रहे हैं।

अंत में ,यदि उत्तराखंड का युवा हिमालय की ऊँचाई को अपने विचारों की ऊँचाई, अपनी नदियों की निर्मलता को अपने चरित्र की निर्मलता और अपनी धरती की दृढ़ता को अपने संकल्प की दृढ़ता बना ले, तो विकसित भारत का सपना केवल एक राष्ट्रीय संकल्प नहीं रहेगा ,वह साकार होती हुई “राष्ट्रीय यात्रा” बन जाएगा।

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