श्री दिनेश ध्यानी जहाँ एक और गढ़वाली/ हिंदी भाषा के साहित्यकार/ कवि हैं। वहीं उनकी एक अहम् पहचान उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संयोजक व एक भाषा शिक्षक के रूप में भी है। दिल्ली में वे उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के माध्यम से वे भाषा शिक्षण कक्षाओं व भाषा सेमिनार आदि का आयोजन व संचालन करते हैं। इस संगठन के माध्यम से महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान/ भाषा शिक्षण कक्षाओं का आयोजन व गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को सविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके अलाव वे उत्तराखण्ड के श्रीनगर में भाषा सेमिनार का आयोजन हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय भाषा विभाग से साथ मिलकर कर चुके हैं। दिल्ली एनसीआर में लगातार सेमिनार, भाषा गोष्ठियों व जंतर मंतर पर धरना आदि के माध्यम से वे गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु भारत सरकार को कई ज्ञापन, मांगपत्र के माध्यम से मांग कर चुके हैं व इस दिशा में उत्तराखण्ड सरकार के प्रतिनिधियों से लगातार मिलकर कई ज्ञापन व मीटिंग कर चुके हैं।

(श्री भीष्म कुकरेती से साहित्यकार/गढ़वाली कवि श्री दिनेश ध्यानी की वार्ता -लिखा भेंट )

भीष्म कुकरेती – कृपया अपने बारे में सक्षिप्त जानकारी दीजिये
जी नमस्कार आदरणीय कुकरेती जी।

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जन्म तिथि -8 अगस्त, 1966
माता पिता नाम – गोलोकवासी माहेश्वरी देवी ध्यानी,
पिता जी गोलोकवासी गोवेर्धन प्रसाद ध्यानी
जन्म स्थल व किस भौगोलिक क्षेत्र से संबंध है – ग्राम- परखण्डाई , पोस्ट- भौन, पट्टी- इडिया कोट तल्ला, ब्लॉक- नैनीडांडा , जिला – पौड़ी गढ़वाल।
शिक्षा – एम ए हिंदी।
आधारिक – आधारिक विद्यालय मुस्याखांद
मिडल /हाई स्कूल / इंटर – जनता इंटर कॉलेज अंदरोली
उच्च शिक्षा – दिल्ली विश्व विद्यालय, हिमाचल विश्व विद्यालय।
आजीविका – सरकारी नौकरी
सम्प्रति – सहायक अनुभाग अधिकारी राज्य सभा सचिवालय।
भीष्म कुकरेती -बाल्य काल या युवाकाल के बारे में जिसने आपको साहित्य में आने को प्रेरित किया।
उत्तर – असल में कक्षा १०वीं से खुद ही लिखना शुरु किया। पहले हिंदी कविता लिखता था। दिल्ली आकर बहुत बाद में पता चला की गढ़वाली में भी लिखा जाता है। तब गढ़वाली में लिखना शुरू किया। प्रेरणा कहूं तो बरिष्ठ साहित्यकार / रंगकर्मी/ चिट्ठी पत्री पत्रिका के संपादक श्री मदन मोहन डुकलाण जी से नब्बे के दशक में मुलाकात होने के बाद उन्होंने लिखने के लिए प्रेरित किया। हिंदी में नब्बे के दशक में पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों में लिखने के लिए बरिष्ठ पत्रकार श्री सुनील नेगी जी ने साहस बंधाया। उन्हीं के मार्गदर्शन में कई राष्ट्रीय अख़बारों व पत्रिकाओं में मेरे लेख आदि प्रकाशित होते रहे। स्वर्गीय पत्रकार मदन जोशी जी ने भी लगातार लेखन हेतु प्रेरित किया और मेरे लेखन को संवारा।
भी . कु. – पहली हिंदी कविता जो पढ़ी।
उत्तर- उठो लाल अब आँखे खोलो
पानी लायी हूँ मुहं धोलो।

भी . कु. – सबसे पहली गढ़वाली कविता से साक्षात्कार –
उत्तर – बरिष्ठ रंगकर्मी श्रीमती संयोगिता पंत/ ध्यानी जी द्वारा 1986 में दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल जी व महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल जी की पुस्तकों से
भी . कु. – अब तक कितनी गढ़वाली कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं (इंटरनेट माध्यम सहित )-
उत्तर – लगभग तीन सौ के करीबन कवितायेँ।
भी . कु. – कितने कविता संग्रह/पुस्तकें प्रकाशित हुए हैं और नाम –
उत्तर -1 गंगा जी का जौ छन भैजी 2 धार ओर -धार पोर
3 न्यूतेर- गढ़वाली कहानी संग्रह, 4 बीरा बैण , गढ़वाली लोक कथा संग्रह
5 ढसाग – गढ़वाली कहानी संग्रह 6 इस्कूल – गढ़वाली बाल कहानी संग्रह।
7 बगत- गढ़वाली कथा संग्रह।
7- कई साझा कविता/कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। अभी दो बाल कहानी संग्रह और एक कहानी संग्रह गढ़वाली में प्रकाशनाधीन हैं। इसके अलावा वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली जी की जीवनी पर भी एक पुस्तक लिख रहा हूँ। इसके अलावा हिंदी में लगभग पचास कहानियां लिखी हैं।
भी . कु. – आप गढ़वाली कविता कब से लिख रहे हैं और क्या चीज ने आपको प्रेरित किया कि गढ़वाली कविता में रचना करें –
उत्तर -सबसे पहले 1984 में जब गांव से दिल्ली आया तो अपनों की खुद और गांव की याद बहुत आती थी तब मैंने गढ़वाली गीत लिखने शुरू किये। उसके साथ ही हिंदी कहानी लिखीं जो डायरी में लिखी हैं उनको अभी प्रकाशित नहीं किया। गढ़वाली भाषा में नब्बे के दशक से कविता लिखनी शुरू की। और बाद में कहानी, नाटक आदि लिखे। कई पुस्तकों की भूमिका, समीक्षा आदि भी समय-समय पर लिखीं हैं।
भी . कु. -आपकी गैर गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उत्तर – यूँ तो कई कविता हैं जो मुझे पसंद हैं लेकिन सबसे अधिक जो दिल को छूती है वह गोपालदास नीरज जी की एक कविता है।

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है।

गोपालदास नीरज जी

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा

पग-तल लेटी निशा, भाल पर
बैठी ऊषा गोरी,
एक जलन से बाँध रखी है
साँझ-सुबह की डोरी

सोये चाँद-सितारे, भू-नभ, दिशि-दिशि स्वप्न-मगन है
पी-पीकर निज आग जग रही केवल मेरी प्यास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!

भी . कु. – कौन सी गढ़वाली पसंदीदा कविता कौन सी है और क्यों
उत्तर – श्री मदन मोहन डुकलाण जी की गढ़वाली कविता –

आंदी जांदी सांस छै तु
म्यरा ज्यूणा की आस छै तु
कटि ही जाला खैरी का दिन
ये मन किलै उदास छै तू।

भी . कु. – आपकी गढ़वाली कविताओं का मुख्य विषय क्या रहा है
उत्तर – पलायन, पीड़ा और वहां की नारी का संघर्ष आदि।
भी . कु. – आपकी कविता वर्ग /क्लास व शैली क्या है ?
उत्तर – यह तो आप जैसे समीक्षक और पाठक ही तय करेंगे। मेरी कविता हो या कहानी मैं तो केवल मन के भावों को कागज़ पर उकेर देता हूँ।
भी . कु. – गजल व नव गीत भी लिखे हैं ?
उत्तर – जी गढ़वाली में ग़ज़ल कहो या गीत लिखे हैं कुछ। नव गीत भी लिखता हूँ।
भी . कु. – नई कविता व नए कविता आंदोलन के बारे में आपकी राय क्या है ?
उत्तर – कविता हमेशा समसामयिक हो तो बेहतर। नई कविता और नए कविता आंदोलन के बाबत तो इतना ही कहूंगा कि लेखक को अपने परिवेश और अपने इर्द-गिर्द घट रही घटनाओं को ध्यान में रखकर लिखना चाहिए। कविता आंदोलन भी कोई सोच कर नहीं होता है। वह तो लेखक के मन के भाव हैं। कोई देश-काल के साथ अपनी कलम को जोड़कर लिखता है और कोई बस लिखता है अपनी रौ में।
भी . कु. – नए प्रयोग करते हैं ?
उत्तर – मै गद्य में गढ़वाली लोक कथाएं / कहानियां/ बाल कहानी लिख रहा हूँ। कोशिश रहती है कि वर्तमान परिवेश से जुड़कर लिखता रहूं।
भी . कु. – आपकी रचनात्मक प्रक्रिया कैसी होती है?
उत्तर – मेरी कोई खास नियमावली नहीं है। मैं तो बस जब टाइम मिलता है लिखता हूँ। जब मन के भाव उमड़ते हैं तब लिखता हूँ। कई बात तो रात अचानक कोई विचार आया तो उठकर आधी रात में भी लिखने बैठ जाता हूँ। नियमित लेखन सम्भव नहीं। क्योंकि और भी बहुत सारे काम हैं, रोजीरोटी भी है और फिर भाषा-साहित्य के छेत्र में कुछ करने का जो लक्ष्य लिया है उसमे अधिकांश समय देना पड़ता है।
भी . कु. – आप किन किन लेखकों, कविओं , ग्रंथों से प्रभावित हैं ?
उत्तर – वैसे तो समय-समय पर कई लोगों की रचनाओं ने प्रभावित किया लेकिन महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल जी क नागराजा महाकाव्य, चांठों का घ्वीड़, महाकवि अबोधबंधु बहुगुणा जी, श्री ललित केशवान जी आदि बरिष्ठ साहित्यकारों के समग्र साहित्य विशेषकर कथा कहानी आदि से प्रभावित हूँ तथा
वर्तमान में बरिष्ठ उपन्यासकार श्री रमेश चंद्र घिल्डियाल सरस जी , श्री चन्दन प्रेमी जी व युवा कवि शोधार्थी श्री आशीष सुंदरियाल आदि की रचनाओं से प्रभावित हूँ। अकादमिक कार्य हेतु बरिष्ठ कवि श्री जयपाल सिंह रावत जी, श्री पायश पोखड़ा जी, श्री दीनदयाल बंदूनी जी, श्री दर्शन सिंह रावत जी आदि अग्रजों से प्रेरित हूँ। ये लोग लगातार प्ररेणा देते रहते हैं भाषाई आयोजनों के लिए। बरिष्ठ समाजसेवी श्री अनिल कुमार पंत जी हमारे समाज के बहुत ही समर्पित व्यक्तित्व हैं उनकी प्रेरणा सन 1986 से लगातार मिल रही है पंत जी समाज के हर सरोकार के लिए चौबीसों घंटे समर्पित हैं। ऐसे लोगों के मार्गदर्शन में हम उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के माध्यम से लगातार बड़े-बड़े आयोजन करते रहते हैं। और स्वयं आप व्यंग्य श्री श्री भीष्म कुकरेती जी के लेखन और सोशल मीडिया और पुस्तक प्रकाशन में में गढ़वाली भाषा के लिए आपके जैसा समर्पित व्यक्तित्व कोई नहीं। इसलिए आप भी हमारे लिए प्रेरणश्रोत हैं।
भी . कु. – आपकी कविताओं का मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर – उद्देश्य तो यही होता है कि लोग उसे पढ़ें और कुछ पढ़कर समाज में कुछ बदलाव आये। जैसे जातिवाद, छुआछूत आदि। उद्देश्य पूरा तभी होगा जब किसी के मन, भावों को बदलने में कामयाब हो। या आपकी कविता किसी के दिल को छू ले। बाकी पाठकों की अपनी- अपनी सोच और भाव हैं। आपको तो अपने मन के भाव कविता के रूप में लिखने हैं।
भी . कु. -क्या वर्तमान गढ़वाली कविताएं समाज को प्रभावित करने में सफल हुयी हैं ? (गीतों को छोड़ दें )
उत्तर – हाँ। वर्तमान कविता समाज को प्रभावित करने में सफल रही है। बाकी आजकल लिखने के साथ-साथ किसी भी रचना पर चर्चा और समीक्षा जरुरी है। पाठकों से संवाद और पहुंच जरुरी है। मतलब आपकी किताब पाठकों के हाथों में पहुंचे। अब धीरे-धीरे ई-बुक्स का जमाना आ रहा है। इससे भी पाठक व समाज प्रभावित होगा ऐसी कामना है।
भी . कु. – क्या कभी किन्ही कविताओं को लिखते समय भिन्न चुनौतियाँ आयी हैं ?
उत्तर – नहीं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि आपने कविता की एक लाइन तो आसानी से लिख दी लेकिन महीनों, साल बीत जाने के बाद भी वो कविता एक लाइन से आगे नहीं बढ़ी। तब अजीब सा लगता है। कई बार आप कविता/कहानी लिखते हो लेकिन आपको लगता है कि इससे कोई बुरा मान जायेगा तो आप उस रचना को रोक देते हो।
भी . कु. – आप कविता प्रकाशन हेतु क्या कार्य करते हो ?
उत्तर – मैं स्वयं टाइपिंग करता हूँ। करेक्शन भी अधिकांश खुद करता हूँ। बाकी प्रकाशक को पुस्तक का प्रारूप बनाने के लिए टाइप करके दे देता हूँ। बाकी सोशल मीडिया में व्लॉग आदि में लगातार कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ।
भी . कु. – क्या आपने शासन की प्रेरणा से गढ़वाली कविता रची हैं ? (जैसे चुनाव में भाग लो , आदि आदि या शासकीय पुस्तक हेतु) -)
उत्तर – जी कभी नहीं। लेकिन समसामयिक और सामाजिक सरोकारों के लिए जरूर लिखा है। शासन के लिए या उसकी मर्जी से लिखने से बेहतर है आप लिखो ही मत। हम किसी सरकार या शासन को खुश करने के लिए क्यों लिखें? अपनी आत्मा को कभी नहीं मारना चाहिए। सच्चा लेखक वही होता है जो देखे वही समाज के सामने लाये। बाकी शासकीय स्तर पर अगर कभी जनहित में या पाठ्यक्रम हेतु कभी मौका मिला तो जरूर लिखेंगे। वैसे मेरी कहानियां खासकर बाल कहानियां पाठ्यक्रम में शामिल हो सकती हैं लेकिन इसके लिए प्रयास नहीं किया कभी।
भी . कु. – क्या किसी पुरस्कार हेतु कविता रचीं हैं ?
उत्तर – जी नहीं। मैं समझता हूँ कि जिसदिन गढ़वाली, कुमाउनी भाषायें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो जायेंगी उससे बड़ा पुरुस्कार मेरे लिए कुछ नहीं। वो मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा। व्यक्ति को अपना काम करते रहना चाहिए। समय और नियति आपको देख रहा है आपका काम होगा तो सबसे पहले आपको आत्मसन्तुष्टि मिलेगी वो सबसे बड़ा पुरस्कार है दूसरे लोग आपके काम से आपको जानेंगे तो आपके लिए वह भी किसी सम्मान से कम नहीं। इसलिए मैं कर्म पर विश्वाश करता हूँ। फल भगवान् पर छोड़ देता हूँ।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए क्या करते हैं?
उत्तर – अपनी कविता हो या कहानियां हों सबसे पहले कोशिश रहती है की पुस्तक मेला, कौथिग, व भाषा सेमिनार आदि के माध्यम से लोगों तक अपनी रचना भेज सकूँ। दूसरे सोशल मीडिया व आंचलिक पत्र/पत्रिकाओं में भी यदा-कदा कविता/कहानी भेजता रहता हूँ। सुधी व विज्ञ पाठकों को भेंट भी करता हूँ।
भी . कु . – पाठक विस्तार हेतु सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हो ?
उत्तर -सोशल मीडिया में समय -समय पर कविता, लेख आदि डालता रहता हूँ। और ऑनलाइन चर्चा व कवि सम्मेलनो के माध्यम से भी भाषा प्रचार करते रहते हैं। कोशिश रहती है की किसी न किसी बहाने से हमारा साहित्य समाज तक पहुंचे।
भी . कु – – क्या आपका ब्लॉग है ?
उत्तर – हिंदी में अक्षर छाया अनिकेत। गढ़वाली में सिलोटु ब्लॉग हैं।
भी . कु. -यूट्यूब में गढ़वाली कविता प्रकाशित करते हो ?
उत्तर – कभी-कभार । लेकिन अक्सर जब भी कवितापाठ करने देशभर में कवि सम्मेलनों में जाता हूँ तो कोई न कोई मेरी कविता यू ट्यूब में डाल देते हैं।
भी . कु. – क्या आपका कोई यूट्यूब चैनल है ?
उत्तर – जी नहीं । लेकिन जल्दी ही शरू करने वाला हूँ।
भी . कु. – क्या आप फिल्मों या अन्य कला रूपों के लिए भी कविता लिखते हैं?
उत्तर – मैने कुछ गीत लिखे तो हैं। लेकिन अभी तक न किसी ने गाये और नहीं कभी मैंने किसी को अप्रोच किया की मेरे गीत गा दो। हां किसी ने मेरे कुछ गीत मेरी बिना अनुमति के जरूर गाये हैं। वीडियो भी बनाये हैं। लेकिन फिल्म को ध्यान में रखकर अभी कुछ स्पेशल नहीं लिखा है। बाकी आजकल के ज़माने में तो आपकी जान-पहचान होनी चाहिए तो आपकी कैसी भी रचना फिल्मों में भी फिट हो जाती है।
भी . कु. – आपकी कविताओं में कौन से तत्व सबसे महत्वपूर्ण हैं
उत्तर – समस्या प्रधान कविता अधिकांश होती हैं। कहीं-कहीं बिद्रोह भी परिलक्षित होता है।
भी . कु. – आपके अनुसार, एक अच्छी कविता क्या होती है?
उत्तर – जो पाठक/श्रोता के मन में उतर जाये। सच्ची बात को सामने रखे और जनसरोकारों से जुडी हो।
भी . कु. – कवि सम्मेलनों में कविता पाठ करते हैं ?
उत्तर – जी। कविता पाठ भी करते हैं और यदा-कदा कवि सम्मेलनों का आयोजन भी करते हैं।
भी . कु. – क्या कारण है कि प्राइमरी स्कूलों में गढ़वाली कविता पाठन , व गढ़वाली नाटक मंचन नहीं हो पता ?
उत्तर – पाठ्यक्रम और शिक्षा नीति के तहत ही स्कूलों में पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। जब तक स्थानीय भाषाओं को महत्त्व नहीं दिया जायेगा तब तक ऐसा ही चलता रहेगा। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत प्रमारी तक स्थानीय भाषा में एक विषय अनिवार्य कर दिया है तो इसका जरूर प्रभाव पड़ेगा और आने वाले समय में गढ़वाली गीत, कविता व नाटक भी पाठ्यक्रम में शामिल होंगे।
भी . कु. – आप अपनी कविताओं को बालिकाओं – बालकों व युवती – युबाओ तक पंहुचाने हेतु क्या ताकत लगाते हो ?
उत्तर – जी, कोशिश रहती है कि नई पीढ़ी तक हमारी किताबें और हमारा भाषा आंदोलन पहुचें। इसलिए -समय पर दूर दराज के स्कूलों में जाते हैं। वहां पुस्तकालयों में अपनी किताबें निशुल्क प्रदान करने की कोशिश रहती है।
भी . कु. – आप भविष्य में किस तरह की कविताएँ लिखना चाहते हैं?
उत्तर – मैं भविष्य में कविताओं से अधिक कहानी, नाटक लिखना चाहूंगा। कविता मेरी समस्या प्रधान हैं और रहेंगी। बाकी गढ़वाली भाषा में कविता बहुत लिखी जा रही हैं। गद्य लेखन पर अधिक ध्यान देना होगा।
भी . कु. – प्रकाशन की क्या क्या समस्याएं हैं व उनका क्या समाधान होना चाहिए ?
उत्तर – प्रकाशन की समस्या तो सदा ही रहेगी। लेकिन फिर भी लेखन और प्रकाशन जारी रहना चाहिए। आज तो दिल्ली में गढ़वाली, कुमावुनि, जौनसारी अकादमी पुस्तक प्रकाशन सहयोग कर रही है। उत्तराखण्ड में भाषा संस्थान, संस्कृति विभाग भी समय-समय पर पुस्तक प्रकाशन सहयोग देता है। इसलिए लिखते रहो आगे बढ़ते रहो। अधिकांश लोगों ने भी खुद के पैसों से अधिकांश पुस्तकों का प्रकाशन किया। आगे कुछ अच्छा होगा लेखन के साथ -साथ इस दिशा में भी काम करना होगा। उत्तराखण्ड सरकार के स्तर पर इस दिशा में गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं के लिए अकादमी का गठन करके इस समस्या का हल हो सकता है।
भी . कु. – पुस्तक वितरण हेतु ग्रामीण गढ़वाल में वितरण की समस्या कैसे सुलझायी जानी चाहिए
उत्तर – जगह-जगह पुस्तकालयों की स्थापना हो और समय-समय पर गावों में पुस्तक मेले आदि का आयोजन हो। भाषा सेमिनार हो तभी लोगों में जागरूकता और अपनी भाषा के प्रति सम्मान बढ़ेगा। इसके लिए हम संस्थागत प्रयास कर रहे हैं कुछ लोग अन्य भी काम कर रहे हैं। लेकिन उत्तराखण्ड सरकार को इस दिशा में आगे आकर काम करना होगा और काम करने वाले लोगों को सहयोग करना होगा।
भी . कु. – आप युवा कवियों को क्या सलाह देना चाहेंगे?
उत्तर – एक- दो पुस्तक प्रकाशन के बाद आराम से नहीं बैठना चाहिए। आप लगातार लिखते रहो । लेखन और से अधिक पाठन जरुरी है। गढ़वाली भाषा में गद्य में भी लिखना जरुरी है। निस बात को युवाओं को समझना होगा। मेरी अधिकांश पुस्तकें कहानी, लोक कथा आदि में हैं। क्योंकि मैं सोचता हूँ कि गढ़वाली में गद्य में अधिक काम होना चाहिए। युवा लेखकों व भाषा प्रेमियों से समाज को अधिक उम्मीदें होती हैं। इसलिए युवाओं को लेखन एक साथ-साथ भाषाई आयोजनों में भी यथा संभव सहयोग करना चाहिए । जरुरी नहीं कि आप आर्थिक ही सहयोग करें, आप विचार, श्रम और आयोजकों के साथ में खड़े होकर भी अपना योगदान दे सकते हैं। जैसा कि आपको पता है गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु लगातार आंदोलन चल रहा है। इसलिए इस आंदोलन में भी युवाओं की भूमिकाअहम् होनी चाहिए । साथ ही भाषा प्रचार-प्रसार में भी अपना योगदान देना चाहिए। युवा देश का भविष्य होते हैं इसलिए उनको अपने बरिष्ठों से सीखना चाहिए और आगे आकर अपने सरोकारों से जुड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
भी . कु. – आप अन्य साहित्यिक विधाओं में रचना रचते हो ?
उत्तर – जी, मैंने गढ़वाली गीत, गढ़वाली कहानी, लोक कथा व नाटक भी लिखे हैं। एक हिंदी कविता संग्रह भी अप्रकाशित है। हिंदी कहानियां भी लिखीं हैं जिनका प्रकाशन होना है।
भी . कु. – युवा गढ़वाली कवि कविता क्षेत्र में आएं हेतु क्या परामर्श है ?
उत्तर – जैसा कि मैंने पहले ही कहा की युवा देश भविष्य हैं। इसलिए युवा कवियों को आगे आकर देश, काल, समाज और परिवेश के अनुसार नव लेखन की तरफ बढ़ना चाहिए। साहित्य सृजन तपस्या मांगता है। इसलिए आपको लेखन के साथ-साथ भाषाई सरोकारों के प्रति भी सजग रहना होगा। आज का बहुसंख्यक युवा सजग है और वह सतर्क होकर आगे बढ़ रहा है। हमें उम्मीद है कि हमारे युवा सर्वांगीण विकास के साथ-साथ भाषा-साहित्य के लिए भी योगदान देंगे।
भीष्म कुकरेती -आप अपने को गढ़वाली कविता संसार में किस स्थान में पाते हो व किस स्थान की कल्पना है
उत्तर – हमारा काम है सिर्फ साहित्य सेवा करना। बाकी स्थान तो आज भी जहाँ खड़े हैं वहीं बने रहे तो प्रभु की कृपा होगी। आपको अपने काम से संतुष्टि मिलनी चाहिए। जगह कभी भी किसी की परमानेंट नहीं होती इसलिए आप काम कीजिये जगह खूब ब खुद बन जाएगी।
भीष्म कुकरेती- आप कविता/कहानी के अलावा गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को सविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए काम कर रहे हैं ? क्या लगता है इससे भाषा का भला होगा?
उत्तर – जी मैं साहित्य सेवा के मुख्य रूप में गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अपने संगठन के माध्यम से व आप जैसे विद्वान और मार्गदर्शक साहित्यकारों/भाषाविदों के नेतृत्व में काम कर रहा हूँ।
भीष्म कुकरेती- इस दिशा में आपने क्या-क्या काम किया है.? और क्या होना चाहिए?
उत्तर- इस दिशा में अभी तक बहुत प्रयास हुए हैं। हमसे पहले भी लोगों ने खूब कोशिश की है। आज देश में 22 भाषाएँ संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। 38 के करीब भाषाएँ आठवीं अनुसूची में शमील होने के लिए लगातार प्रयत्न कर रही हैं। हमने भी 2012 से अभी तक 4 ज्ञापन भारत सरकार के गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय को दे चुके हैं। देशभर में जहाँ-जहाँ हमारे लोग हैं सब जगह हम लोगों से अपील कर रहे हैं कि इस दिशा में सहयोग करें, सरकारों को ज्ञापन के माध्यम से बताएं। सेमिनार, धरना, भाषा गोष्ठी आदि व विशेषकर स्कूलों, कॉलेजों में हम लगातार नई पीढ़ी को इस मुहिम में जोड़ रहे हैं। आगे बहुत काम करना होगा।
भीष्म कुकरेती- उत्तराखण्ड सरकार से आपको क्या उम्मीद हैं?
उत्तर- हम उत्तराखण्ड सरकार से मांग करते हैं कि सबसे पहले उत्तरखण्ड विधानसभा में प्रस्ताव पर चर्चा के बाद सदन से पास करके केंद्र सरकार को भेजा जाना चाहिए कि गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाये। दूसरा हम चाहते हैं कि उत्तराखण्ड में गढ़वाली-कुमाउनी अकदामी का गठन हो। भाषा संस्थान के माध्यम से गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं का विकास और संरक्षण नहीं हो सकता है। क्योंकि भाषा संस्थान में वे भाषाएँ हैं जो संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हैं। गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को विशेष संरक्षण व पोषण की आवश्यकता है। इसलिए इस पर प्रदेश सरकार गौर करे। इस हेतु हम मुख्यमंत्री सहित भाषा मंत्री व कई विधायकों को मिलकर ज्ञापन दे चुके हैं। आनेवाले समय में हम इस दिशा में और मुखर होकर अपनी बात रखेंगे। ताकि हमारी अकादमी का गठन हो। जब दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी का गठन हो सकता है तो उत्तराखण्ड में क्यों नहीं ?
भीष्म कुकरेती- आप उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के माध्यम से बच्चों को गढ़वाली-कुमाउनी-जौनसारी भाषा भी सिखा रहे हो ?
उत्तर- जी। हम वर्ष 2016 से लगातार दिल्ली-एनसीआर, उत्तराखण्ड के श्रीनगर, अल्मोड़ा, बागेश्वर, देहरादून में ग्रीष्मकालीन कक्षाओं का आयोजन निशुल्क करते हैं। इसलिए अलावा विगत वर्ष 2024 से इंग्लैंड में भी भाषा शिक्षण कक्षाओं का ऑनलाइन आयोजन करते हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी भाषा-साहित्य, संस्कृति व सरोकारों से परिचय होता है। नई पीढ़ी अपनी भाषा के बारे होती है। इसलिए यह हमारा मुख्य मिशन है और आगे भी हम इसे और विस्तार देंगे।
भीष्म कुकरेती- आपको किस प्रकार के कवि रूप में याद किया जाएगा ?

उत्तर – कवि/साहित्यकार के अलावा गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए एक भाषा आंदोलनकारी के रूप में। एक समर्पित भाषा प्रेमी के रूप में।
भीष्म कुकरेती- आभार आपका ध्यानी जी इस साक्षात्कार हेतु।
उत्तर- आपका भी हार्दिक आभार आदरणीय गुरु जी। आपके जज्बे और निरन्तर साहित्य सृजन व भाषा के इतिहास, व्याकरण समेत हर विधा पर समय-समय पर हम जैसे कई लोगों को प्रेरणा देने के लिए आपका बहुत -बहुत धन्यवाद।

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