दिल्ली के एलटीजी सभागार में दर्शन सिंह रावत के गढ़वाली नाटक 'असंद' के मंचन का एक दृश्य।दर्शन सिंह रावत का "असंद" गढ़वाली नाटक: दिल्ली के एलटीजी सभागार में गूंजी तालियां, विकास और छुआछूत पर करारा व्यंग्य

नई दिल्ली: दिल्ली के मंडी हाउस स्थित प्रतिष्ठित एलटीजी सभागार में गढ़वाली नाटक “असंद” का बेहद सफल, ऐतिहासिक और भव्य मंचन किया गया। उत्तराखंड फिल्म एवं नाट्य संस्थान तथा गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम ने दिल्ली-एनसीआर के दर्शकों का दिल जीत लिया। इस नाटक के माध्यम से उत्तराखंड के ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी विकास के बड़े-बड़े दावों की जमीनी हकीकत को पूरी ईमानदारी के साथ उजागर किया गया है।

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इसके साथ ही, हमारे आधुनिक समाज में आज भी गहरी जड़ें जमाए बैठी छुआछूत जैसी अमानवीय सामाजिक कुप्रथा और जातिवाद की गंभीर समस्या पर बेहद करारा व्यंग्य किया गया है, जिसने सभागार में मौजूद प्रत्येक दर्शक को झकझोर कर रख दिया।

दर्शकों को बांधे रखने में सफल रही कहानी


उत्तराखंड के ग्राम परखण्डाई की सड़क की खस्ताहाल समस्या और पहाड़ों में जातिवाद व छुआछूत के गंभीर विषय पर आधारित “असंद” नाटक दर्शकों को एक बड़ा संदेश देने में कामयाब रहा। नाटक की पटकथा इतनी चुस्त और कलाकारों का जीवंत अभिनय इतना प्रभावशाली था कि नाटक के समाप्त होने के बाद भी दर्शक मंत्रमुग्ध होकर अपनी सीटों पर डटे रहे।

पूरा एलटीजी सभागार काफी देर तक दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट और ‘वंस मोर’ के नारों से गूंजता रहा। कार्यक्रम में उपस्थित प्रबुद्ध दर्शकों का कहना था कि उन्होंने लंबे समय बाद दिल्ली के किसी बड़े मंच पर ऐसा बेहतरीन, प्रासंगिक और समस्या-प्रधान नाटक देखा है, जिसने बिना किसी लाग-लपेट के सीधे समाज की कड़वी सच्चाई को बयां करते हुए लोगों के दिलों पर सीधी दस्तक दी है।

युवा निर्देशन और कलाकारों की शानदार जुगलबंदी


इस बेहतरीन और विचारोत्तेजक “असंद” नाटक का सफल और कुशल निर्देशन युवा नाटककार रवीन्द्र सिंह रावत (गौरी) ने किया, जिन्होंने नाटक के हर मोड़ पर दर्शकों की उत्सुकता को बनाए रखा। वहीं, सह-निर्देशन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वीरेन्द्र सिंह गुसाईं ने पूरी लगन और तकनीकी कुशलता के साथ संभाली। नाटक के हर एक दृश्य को मंच पर जीवंत बनाने और कहानी के मूल भाव को उभारने में उत्तराखंड के वरिष्ठ रंगकर्मी एवं स्वयं इस नाटक के लेखक दर्शन सिंह रावत ने मुख्य भूमिका निभाई। उनके मंच पर आते ही दर्शकों का उत्साह दोगुना हो गया।

उनके साथ ही इस नाटक की टीम में उत्तराखंडी रंगमंच के कई अन्य मंझे हुए और प्रतिभावान कलाकारों ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। इन कलाकारों में धर्मवीर सिंह रावत, गिरधारी रावत, उमेश बंदूनी, मुस्कान भंडारी, अंजू भंडारी, संतोष बडोनी, वीना ढौंडियाल, शशि बडोला, रामपाल किमोली, धर्मेंद्र प्रसाद, संगीता सुयाल, आई पी उनियाल, जगमोहन सिंह रावत बुगाणा, शेखर भट्ट, राहुल बलूनी और अनुज कण्डारी शामिल रहे। सभी कलाकारों के बीच की बेहतरीन जुगलबंदी, सटीक कॉमिक टाइमिंग और गंभीर दृश्यों में उनके भावपूर्ण अभिनय ने नाटक के स्तर को एक नई वैश्विक ऊंचाई प्रदान की।

संगीत और मंच संचालन ने बांधा समां


किसी भी नाटक की सफलता में उसके पार्श्व संगीत का बहुत बड़ा हाथ होता है, और “असंद” नाटक की तो रीढ़ ही इसका संगीत रहा। इसने पूरी कहानी में नए रंग भरने, दृश्यों को गहराई देने और नाटक की गति को बनाए रखने का बेहतरीन काम किया। वरिष्ठ कलाकार श्री शशि बडोला द्वारा लिखे बेहद ही मर्मस्पर्शी गीत “जाग जाग हे उत्तराखंडी...” ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। इसके साथ ही, राकेश गुसाईं के दमदार, कर्णप्रिय और सटीक पाश्र्व संगीत ने पूरी नाट्य प्रस्तुति में प्राण फूंक दिए। संगीत के इस उतार-चढ़ाव ने कई मौकों पर दर्शकों को भावुक कर दिया। वहीं दूसरी ओर, कार्यक्रम का कुशल, मर्यादित और गरिमापूर्ण मंच संचालन सुमित्रा किशोर, सविता पंत और सुरेश नौटियाल की अनुभवी तिकड़ी ने बखूबी किया। इस तिकड़ी ने अपनी अनूठी शैली से कार्यक्रम के प्रवाह को शुरुआत से लेकर अंत तक पूरी तरह से बांध कर रखा।

सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक दिग्गजों की रही गरिमामयी मौजूदगी

दिल्ली के सांस्कृतिक केंद्र मंडी हाउस में हुए इस भव्य नाट्य आयोजन में प्रवासी उत्तराखंडी समाज और कला जगत के प्रबुद्ध जनों का भारी हुजूम उमड़ा। पैर रखने तक की जगह सभागार में शेष नहीं थी। इस खास और ऐतिहासिक मौके पर गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी की ओर से श्रीमती भारती मनराल विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं और उन्होंने इस प्रयास की सराहना की। इसके साथ ही, उत्तराखंड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी, जयपाल सिंह रावत, अनिल पंत और गढ़वाली व कुमाउनी फिल्मों के सुविख्यात निर्माता, निर्देशक एवं लोकप्रिय नायक राकेश गौड़ भी इस गौरवशाली पल के गवाह बने।

इन विशिष्ट महानुभावों के अलावा, प्रसिद्ध कौथिग (महाकौथिग) के मुख्य संयोजक राजेंद्र चौहान, उत्तराखंड के वरिष्ठ रंगकर्मी विनोद कुमार रावत और खुशाल सिंह बिष्ट सहित दिल्ली-एनसीआर के कई जाने-माने वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध समाजसेवियों ने कार्यक्रम में शिरकत की। सभी अतिथियों ने नाटक की समाप्ति पर मंच पर जाकर कलाकारों का हौसला बढ़ाया, उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट किए और दिल्ली जैसे महानगर में अपनी लोकभाषा और संस्कृति को जीवित रखने के इस गंभीर प्रयास की मुक्तकंठ से सराहना की।

निष्कर्ष
यदि समग्र रूप से देखा जाए, तो कई वर्षों के लंबे इंतजार और कड़े संघर्ष के बाद दिल्ली-एनसीआर के प्रवासी उत्तराखंडी समाज को इस उच्च स्तर, उच्च तकनीक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े गढ़वाली नाटक का मंचन देखने का सौभाग्य मिला है। अपनी मजबूत, धारदार और प्रासंगिक पटकथा, कलाकारों के लाजवाब व जीवंत अभिनय, कर्णप्रिय पारंपरिक संगीत और समाज को आईना दिखाने वाले बेहद सटीक संदेश के कारण “असंद” नाटक दर्शकों को बांधने और पहाड़ की मूल सामाजिक पीड़ा को उन तक पूरी गहराई से पहुंचाने में शत-प्रतिशत सफल रहा।

यह अभूतपूर्व और सफल आयोजन दिल्ली में गढ़वाली रंगमंच के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होगा, जो निश्चित रूप से भविष्य में भी हमारी लोकभाषाओं (गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी) के नाटकों और फिल्मों के लिए सफलता के नए द्वार खोलेगा।