नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026 की पूजा के बाद बिदाई का मार्मिक दृश्यनंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026: 12 साल बाद सिद्धपीठ कुरुड़ से कैलाश के लिए रवाना हुई मां नंदा की डोली, उमड़ा जनसैलाब

नंदानगर : उत्तराखंड के चमोली जिले से आस्था, संस्कृति और लोक परंपरा का ‘हिमालयी महाकुंभ’ शुरू हो चुका है। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद, नंदानगर (घाट) स्थित पावन सिद्धपीठ मां नंदा देवी मंदिर कुरुड़ से नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026 का ऐतिहासिक और भव्य शुभारंभ हो गया है। ढोल-दमाऊं की पारंपरिक थाप, शंखनाद और ‘जय मां नंदा’ के गगनभेदी जयकारों के बीच मां नंदा देवी की उत्सव डोलियां अपने मायके से ससुराल (कैलाश) के लिए विदा हो गई हैं। इस भावुक और अलौकिक विदाई को देखने के लिए कुरुड़ धाम में हजारों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।

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280 किमी की कठिन और पवित्र पैदल यात्रा

5 सितंबर से शुरू हुई यह नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026 आगामी 30 सितंबर 2026 तक चलेगी। लगभग 26 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान श्रद्धालु करीब 280 से 296 किलोमीटर का कठिन हिमालयी पैदल सफर तय करेंगे। कुरुड़ के हक-हकूकधारियों और मंदिर समिति के नेतृत्व में आयोजित यह धार्मिक महायात्रा देवभूमि की सबसे बड़ी और कठिन पैदल यात्राओं में से एक मानी जाती है। मां नंदा की डोली विभिन्न पड़ावों, गूट गांवों और वाण गांव से गुजरते हुए उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित रूपकुंड (कैलाश) तक पहुंचेगी।

कुरुड़ से रूपकुंड-होमकुंड यात्रा मार्ग के प्रमुख पड़ाव

  1. कुरुड़ मंदिर (नंदानगर, चमोली): यात्रा का मुख्य प्रस्थान बिंदु, जहाँ से मां नंदा की पवित्र डोली और गर्भगृह से त्रिशूल लेकर श्रद्धालु प्रस्थान करते हैं।
  2. शुरुआती पड़ाव: डोली कुरुड़ से आगे बढ़ते हुए सुतोल, पैरी, सितेल और थराली/घाट क्षेत्रों के पारंपरिक मार्गों से होकर गुजरती है।
  3. मुंडोली और वान गांव (Wan Village): वान गांव, इस यात्रा का एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहाँ प्रसिद्ध लाटू देवता का मंदिर है, जिनकी अनुमति और पूजा के बाद ही तीर्थयात्री ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं।
  4. गैरोली पातल और बेदनी बुग्याल (Bedni Bugyal): वान से आगे बढ़ते हुए श्रद्धालु एशिया के सबसे खूबसूरत और विशाल घास के मैदानों (बुग्यालों) में प्रवेश करते हैं। बेदनी कुंड में पवित्र स्नान और पूजा की जाती है।
  5. पातर नचौणियां (Patar Nachoniya): यह बेदनी से आगे का ऊंचाई पर स्थित पड़ाव है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता के प्रकोप से यहाँ राजा की नर्तकियां पत्थर की बन गई थीं।
  6. कैलवा विनायक (Kalu Vinayak): यहाँ अत्यंत ऊंचाई पर स्थित भगवान गणेश का एक प्राचीन मंदिर है।
  7. भगवाबासा (Bhagwabasa): रूपकुंड से ठीक पहले का यह अंतिम बेस कैंप है, जहाँ चारों तरफ केवल चट्टानें और बर्फ देखने को मिलती है।
  8. रूपकुंड (Roopkund ) : समुद्र तल से लगभग 15,750 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह रहस्यमयी झील है, जहाँ प्राचीन मानव कंकाल पाए जाते हैं। राजजात और बड़ी जात के दौरान भक्त यहाँ मां नंदा की विशेष अर्चना करते हैं।
  9. ज्योंरागली पास और शिलासमुद्र (Shila Samudra): रूपकुंड और ज्योंरागली दर्रे (Junargali Pass) को पार करने के बाद यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा ‘शिलासमुद्र’ (बर्फ और पत्थरों का समंदर) आता है।
  10. होमकुंड (Homkund ): यह यात्रा का अंतिम और सबसे पवित्र गंतव्य है (लगभग 4,320 मीटर)। यहीं पर महायज्ञ के बाद चार सींगों वाले पवित्र मेढ़े (चौसिंग्या खाडू) को सजाकर अकेले कैलाश पर्वत की ओर विदा कर दिया जाता है।

चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा) करेगा नेतृत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026 में मां नंदा की विदाई के लिए एक विशेष चार सींगों वाला मेढ़ा, जिसे स्थानीय भाषा में ‘चौसिंग्या खाडू’ कहा जाता है, पूरी यात्रा का नेतृत्व कर रहा है। कुरुड़ सिद्धपीठ से शुरू हुई डोलियों के साथ यह खाडू भी रूपकुंड तक जाएगा और नंदाष्टमी-नवमी के पावन अवसर पर मां नंदा की डोली के साथ उसे निर्जन हिमालयी क्षेत्र में विदा किया जाएगा।

धियाणियों की नम आंखें और लोक संस्कृति का संगम

पहाड़ में मां नंदा को क्षेत्र की बेटी माना जाता है। जब मंदिर परिसर में मां नंदा ने अपने पशुआ (अवतार) पर रूप धारण कर भक्तों को यात्रा की आज्ञा दी, तो वहां उपस्थित धियाणियों (बेटियों) और प्रवासियों की आंखें नम हो गईं। इस महायात्रा को लेकर केवल नंदानगर ही नहीं, बल्कि दशोली, बंड, लाता और बधाण क्षेत्र के गांवों में भी जबरदस्त उत्साह है। जगह-जगह मां की डोली के स्वागत के लिए स्वागत द्वार बनाए गए हैं और हर गांव में रात्रि विश्राम के दौरान भव्य जागर व अनुष्ठान आयोजित किए जा रहे हैं।

सुरक्षा और व्यवस्था के कड़े इंतजाम

चमोली प्रशासन और स्थानीय पुलिस की ओर से नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026 को सुरक्षित और सुगम बनाने के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। यात्रा मार्ग और उच्च हिमालयी निर्जन पड़ावों (जैसे रामणी, वेदनी बुग्याल, पाताल नचौनियां) पर श्रद्धालुओं के ठहरने, स्वास्थ्य सुविधाओं और भोजन (भंडारे) की व्यवस्था स्थानीय समितियों और प्रशासन के सहयोग से की जा रही है।

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