गौरा देवी पुरस्कार से सम्मानित हुए रिंगाल मैन राजेंद्र बड़वालरिंगाल मैन राजेंद्र बड़वाल गौरादेवी पुरस्कार से हुए सम्मानित रिंगाल को दी नई पहचान

गौरा देवी पुरस्कार से सम्मानित हुए रिंगाल मैन राजेंद्र बड़वाल

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चमोली : विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर मिलेट वैली उर्गम घाटी में आयोजित भव्य कार्यक्रम में पारंपरिक हस्तशिल्प कला को आधुनिक पहचान देकर रोजगार और पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाले उत्तराखंड के चमोली जिले के प्रसिद्ध हस्तशिल्पी राजेन्द्र बड़वाल, जिन्हें लोक-साहित्य और कला जगत में ‘रिंगाल मैन’ के नाम से जाना जाता है, को प्रतिष्ठित गौरा देवी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें यह सम्मान पारंपरिक रिंगाल हस्तशिल्प कला के संरक्षण, स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।

जनपद चमोली के दशोली विकासखंड के किरूली गांव निवासी राजेंद्र बड़वाल विगत 16 वर्षों से अपने पिता दरमानी बड़वाल के साथ मिलकर पीढ़ियों से चली आ रही अपने परिवार की रिंगाल हस्तशिल्प की कला को नया रूप देकर नई पहचान देने में लगे हैं। जहां उनके पिता पिछले 52 वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं, वहीं राजेंद्र बड़वाल ने इसे आधुनिक स्वरूप देकर नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का कार्य किया है।

पारंपरिक रिंगाल को बनाया रोजगार का सशक्त माध्यम

राजेंद्र बड़वाल ने पारंपरिक रिंगाल उत्पादों को आधुनिक डिजाइनों के साथ प्रस्तुत कर इस उद्योग को नई पहचान दिलाई है। पहले जहां रिंगाल से केवल पांच-छह प्रकार के उत्पाद बनाए जाते थे, वहीं आज 200 से अधिक प्रकार के आकर्षक और उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।
पहाड़ में खेती और पशुपालन के सिमटने से संकट में आए परंपरागत रिंगाल उद्योग को राजेंद्र बड़वाल ने संजीवनी देने का कार्य किया है। जहां मॉर्डन फर्नीचर्स केवल दिखावे तक सीमित है वहीं रिंगाल के उत्पादों से घरों की शोभा वास्तविक रूप से बढती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में रिंगाल को उच्च दर्जा प्राप्त है। फूलों की टोकरी से लेकर रिंगाल की छंतोली इसका उदाहरण है।


बाजार में राजेंद्र बदवाल के उत्पादों की काफी मांग


राजेंद्र बड़वाल ने रिंगाल की टहनियों से केवल पारंपरिक टोकरियां ही नहीं, बल्कि कई कलाकृतियां और पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार किए हैं। उनके द्वारा मेहनत और लगन से बनाई गयी रिंगाल की छंतोली, ढोल दमाऊ, हुडका, लैंप शेड, लालटेन, गैस, टोकरी, फूलदान, घौंसला, पेन होल्डर, फुलारी टोकरी, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोपी, स्ट्रै, पूजा टोकरी, फाइल फोल्डर, लैंप, गैस, मंदिरों के डिजाइन, सर्विस टोकरी, झूमर, झाड़ू, कूड़ेदान, पैन स्टेंड, खूबसूरत ज्वैलरी, कलाई में बांधे जाने वाले आकर्षक बैंड, रिंगाल की राखी, मोनाल, स्ट्रैं, वाटर बोतल, मंदिरों के डिज़ायनों को लोगों नें बेहद पसंद किया है। उनके द्वारा बनाए गए सभी उत्पादों की बाज़ार में बहुत मांग है। उनकी हस्तशिल्प के मुरीद उत्तराखंड में हीं नहीं बल्कि देश के विभिन्न प्रदेशों से लेकर विदेशों में बसे लोग भी है।

पुरस्कार का महत्व

पर्यावरण और लोक संस्कृति के प्रतीक चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी के नाम पर मिलने वाला यह पुरस्कार राजेंद्र बड़वाल के उसी संरक्षण और नवोन्मेष (Innovation) के प्रयासों को मान्यता देता है। इससे उत्तराखंड के लुप्त होते पारंपरिक कुटीर उद्योगों और स्थानीय हस्तशिल्पियों को नया प्रोत्साहन मिलेगा।