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आप सभी से कह रहा है पहाड़-आ लौट आओ फिर से मेरे आंगन में
कभी बहुत मचलता था मैं
क्योंकि मेरे आँगन में सब रंग खिलते थे
भरा पूरा रहता था ये आँगन
विभिन्न पंछियों का यहाँ डेरा था
इंसानो का लगा रहता मेला था।
कठोर प्रवर्ति है मेरी पठारनुमा हूं मैं
घने जंगल और वनो से सजा था मैं
मस्त पवन के हिलोरे मुझसे टकरा
पेड़ पौधों से अठखेलियां करती थी
नदियों का मधुर संगीत मेरे रोम रोम को पोषित कर
मनुष्य का जीवन कहलाती थी।
अपनी कठोर मेहनत के तप से
मुझपे मनुष्य ने जीवन संवारा था
आवाद था में भी चारों ओर
अम्बर में भी अजब नज़ारा था
वो जीवन भी मेरा कितना प्यारा था।
हिमालय के बीच अडिग था मैं
गंगा यमुना की लहरों संग
देवों के पावन कदमों की धूल लिए
ऋषियों का तपोवन कहलाता था मैं
अफ़सोस कि जब से मनुष्य की
भौतिक महत्वकांक्षा जागृत हुई है
तब से कलंकित और शापित हूँ मैं।
अब मेरा जिगर भी छलनी हो चुका है
यादों के अवशेष भी मिटने लगे हैं
जहां गूंजती थी बच्चों की किलकारियां
वहां अब बिराने पड़े है
कभी पंछियों का था यहां डेरा
वो भी अब साथ छोड़ चुके हैं
खनन और अंधाधुंध पेड़ों के कटने से
मेरा अस्तित्व भी मिटने लगा है।
हे पृथ्वी लोकवासी अगर तेरी
भौतिक महत्वकांक्षा पूर्ण हो गई हो
या फिर देव भूमि का लोभ जो हो शेष
तो आ मेरे आँगन में
मुझे फिर से रोपित कर
मैं तुझे देवलोक में देवदर्शन कराऊंगा
तेरे निश्छल प्रेम से गंगा यमुना को लुभाऊँगा।
आ लौट आओ फिर से मेरे आँगन में
मेरे मुरझाए व बंजर ललाट पर
अपने आगमन से ख़ुशी के फूल खिला
मासूम किलकारियों से
मेरे बिराने को फिर से गुंजायमान कर
इस चमन को अपने होने का अहसास दिला जा
अहसानमंद रहूंगा तेरा
जो तू मुझपे जीवन के रंग सजा जा।
उपभोग की वस्तुओं को रोपित कर
पर्यावरण से होने वाले नुकसान से बचा लो
प्रकृति से होने वाले खिलवाड़ को रोक
तुम एक नया जीवन बसा लो
मायारूपी संसार को त्याग मुझको अपना लो
मैं फिर से अपना अस्तित्व पा लूंगा
आतुर बैठा हूं मैं मुझसे तेरे गांव के मिलन में
आ लौट आओ फिर से मेरे आँगन में।
©द्वारिका चमोली
