उत्तराखंड : अपने पैतृक घरों की लोग ले रहे सुध दिवाली पर दिखे गांव गुलज़ार इस गांव में चार दशक बाद मनी दिवाली





Diwali (बग्वाल)
 : उत्तराखंड के युवा अब अपने पैतृक घरों से प्रेम करने लगे हैं। महानगरों की भाग दौड़ और प्रदूषण के साथ साथ उन्हें पहाड़ों के जीवन के महत्व का भी आभास होने लगा है। इसके लिए सोशल मीडिया का आभार जिन्होंने इन युवाओं को इस स्वर्ग सी धरती के वैदिक और वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर मानसिक व शारीरिक रूप से जीवन पर पड़ने वाले उत्तम प्रभाव का आभास कराया। अपने पैतृक घरों के प्रति प्रवासियों का लगाव इस कदर बढ़ गया है कि वो न केवल अपने घर गांव में अपने मकानों को संवार रहे है बल्कि नए मकान भी बना रहे है और तीज त्यौहारों पर घर की रौनक भी बढ़ा रहे हैं। 

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इस बार दिवाली के त्यौहार को अनेकों प्रवासियों ने उत्तराखंड में अपने गांव में जाकर पुराने रीती रिवाजों के साथ मनाया। इससे गांव में रहने वाले बुजुर्गों को भी एक संजीवनी मिली है। गांवों में ख़ास तौर पर सड़क कनेक्टिविटी होने से भी अब लोग रिवर्स पलायन करने का मन भी बना रहे हैं। 

ऐसा ही मामला है कर्णप्रयाग के स्वर्का गांव का। इस गांव के मुख्य तोक से कई परिवार सालों पहले पलायन कर दिल्ली सहित अन्य जगह बस गए। दो साल पहले यहां प्रवासी युवा प्रदीप मैखुरी और डॉ संजय मैखुरी ने अपने पुराने घरों में दीए जलाकर दिवाली मनाई थी। जिसके बाद अब इन युवाओं ने वहां घर बनाए हैंं।



गांव के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता टीका प्रसाद मैखुरी ने बताया कि गांव में सड़क पहुंचने के बाद दो परिवारों ने अपने नए घर बनाए हैं। तीन परिवारों ने मरम्मत की है. जबकि दो अन्य अपने मकानों का जीर्णोद्धार कर नया बनवा रहे हैं। ऐसे में गांव जहां पलायन की त्रासदी से खाली हो रहा था वहीं अब प्रवासियों की पहल से गांव में रौनक़ लौटने की उम्मीद बन रही है। खास तौर पर तीज त्यौहार, सामाजिक और सार्वजनिक कार्यों में गांव गुलजार हो रहा है।




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