उत्तराखंड की महिलाएं करवा चौथ व्रत के आकर्षण में क्यों बिसर रही है सकट चौथ का व्रत  

दिव्य पहाड़ : उत्तराखंड की संस्कृति में सकट चौथ व्रत का विशेष महत्त्व है जो करवा चौथ व्रत  की तरह ही निर्जल रहकर किया जाता है। कुछ वर्षों पूर्व तक पहाड़ों में करवा चौथ व्रत का कोई अस्तित्व नहीं था और न ही इसके बारे में कोई जानता था किंतु समय के साथ सोशल मीडिया और टीवी सीरियलों के माध्यम से वहां की नई पीढ़ी ने इसे अपनाना शुरू किया और आज वहां भी इस व्रत पर महिलाएं शहरों की तरह पूरी साज सज्जा के साथ पूरे विधि विधान से इसे मनाने लगी है। 

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आज उत्तराखंड के पहाड़ों में भी बाजार सजे पड़े हैं और खरीदारी के लिए महिलाओं की भीड़ देखी जा सकती हैं। उनके द्वारा इस दिन सोने चांदी के आभूषणों की भी खूब खरीदारी की जा रही है। उनका कहना है कि पति की लंबी आयु के लिए लिया जाने वाला व्रत हर विवाहित महिला को लेना चाहिए। इससे मां पार्वती का आशीष भी मिलता है। हालांकि वहां पुराने लोग अभी भी इस व्रत को नहीं मानते लेकिन बच्चों की ख़ुशी के लिए वो उनके साथ खड़े जरूर दिखाई देते हैं।

यहाँ ये बता दूं कि सनातन संस्कृति में अन्य संस्कृति को अपनाना अच्छी बात है लेकिन उसके लिए अपनी संस्कृति को नज़र अंदाज़ कर देना ठीक नहीं। आज उत्तराखंड में लगभग हर विवाहित महिला जो करवा चौथ व्रत रखती हैं उनमें से केवल 10 प्रतिशत ही उत्तराखंडी संस्कृति के प्रतीक सकट चौथ के व्रत के बारे में जानती होंगी। 

क्या है सकट चौथ व्रत

माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत रखा जाता है। इसमें भगवान गणेश का आव्हान किया जाता है। स्त्रियां सुबह सुबह नहा धोकर गणेश, शंकर व मां पार्वती का ध्यान धर उनकी पूजा करते हैं । रात को चांद देखने के बाद उसे अर्ध देकर अन्न जल ग्रहण करते हैं। 

सकट चौथ को संकष्टी चतुर्थी एवं तिलकुटा चौथ भी कहा जाता है। इस व्रत में भी स्त्रियां करवाचौथ की तरह निर्जल रहकर अपनी संतानों, पति व परिवार की लंबी उम्र तथा समृद्धि के लिए कठोर व्रत करती हैं। यह व्रत संतान और परिवार के जीवन में आने वाले हर संकट और बाधा से उन्हें बचाता है। इस दिन संकट हरण गणेश जी का पूरे विधि विधान के साथ पूजन किया जाता है। उत्तराखंड में पहले इस व्रत को प्रत्येक विवाहित स्त्रियां रखा करती थी किंतु युवा पीढ़ी के आधुनिकता के रंग में रंगने से या फिर काम काज की भाग दौड़ में लोग इसे लगभग भुला ही चुके हैं हां पहाड़ में रहने वाली कुछ महिलाएं आज भी ये व्रत करती हैं ।