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                              Photo credit by amarujala

उत्तराखंड के ऐसे गांव जहां डोली के बजाय घोड़े में बैठाकर की

जाती है दुल्हन की विदाई 

इस आधुनिक जीवन में जहां हम सदा बदलाव चाहते है, शहर ही क्या हिंदुस्तान के गांवों की तस्वीर भी इक्कसवीं सदी के रंग में रंगी नज़र आती है ऐसे में क्या कभी आपने किसी शादी समारोह में दुल्हन की विदाई डोली की बजाय घोड़ी में होते देखा है। मेरी इस बात पर आप जरूर आश्चर्य में पड़ गए होंगे किन्तु यह सत्य है।  तो चलिए आपको बताते है कि आज भी कुछ गांव ऐसे है जो अपनी परम्पराओं को  वखूबी निभा रहे है। 

कहां स्थित है ये गांव 

उत्तराखंड के सुदूरवर्ती जनपद चमोली के दशोली ब्लॉक के ईराणी क्षेत्र  के कुछ गांव आज भी सड़क मार्ग से 25-30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  इसी क्षेत्र में नंदा देवी राजजात का अंतिम पड़ाव वाण गांव भी पड़ता है जहां लोग मां नंदा देवी और उनके धर्म भाई लाटू को अपना आराध्य मानते हैं । देवाल से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वाण गांव 

समय के साथ-साथ उत्तराखंड के गांवों में भी लोग अपने पुराने रीती-रिवाजों और परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। वहीं दौड़ती भागती जिंदगी में समय की पांवंदी के चलते भी अब शादी विवाह की रस्में भी धीरे धीरे कम होने लगी है यहां तक कि अब पहाड़ों में एक दिवसीय विवाह का प्रचलन चल पड़ा है जिसमें न मांगल गीत होते है और न ही ठीक से हल्दी हाथ की रस्म। ढोल दमों व मसक बाजे की जगह बैंड बाजों ने ले ली है पर इतना कुछ हो जाने के बाद भी चमोली के दशोली ब्लॉक के लगभग एक दर्जन गांवों में अपनी कन्या की विदाई और पुत्रवधु का स्वागत घोड़े में बैठाकर किया जाता है। 

आखिर क्या है इसके पीछे की मान्यताएं 

वाण गांव के स्थानीय लोगों के मुताबिक एक बार मां नंदा अपने धर्म भाई लाटू से मिले बिना हिमालय के लिए चल पड़ी किंतु आगे दुर्गम रास्ता होने की वजह से वो आगे न जा सकी जब लाटू को पता चला उन्होंने मां नंदा को घोड़े पर बैठाकर हिमालय भेजा था  इसलिए ये लोग विवाह में अपनी कन्याओं को घोड़े में बैठाकर विदा करते हैं।  

एक अन्य किवंदती है कि इस क्षेत्र के लोग राजजात यात्रा में मां नंदा को डोली में बैठाकर विदा करते है ऐसे में उनके सम्मान के लिए वो अपनी बेटियों की विदाई डोली में न कर घोड़े पर बैठाकर करते हैं। दूसरी और ईराणी क्षेत्र के पाण गांव के लोगों का कहना है कि हमें ठीक से नहीं पता कि ये परंपरा कब से चली आ रही है पर हम अपने पूर्वजों की इस परंपरा को आज भी वखूबी निभाते हैं। 

स्थानीय लोगों के अनुसार विदाई के समय कोई विदाई गीत नहीं गाया जाता बस ढोल दमों और मसकबाजों की धुन पर विदाई होती है।