उत्तराखंड : हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी पखवाड़ा समारोह और भारतीय भाषाओं से गढ़वाली भाषा का सह-संबंध' विषय पर व्याख्यान का हुआ सफल आयोजन


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श्रीनगर : हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय के चौरास परिसर स्थित ‘स्टूडेंट्स एक्टिविटी सेंटर’ में 14 सितंबर से आयोजित हिंदी पखवाडे का मंगलवार 30 सितंबर को समापन समारोह का आयोजन हुआ। इस दौरान हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत हुई विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कार वितरण किए गए साथ ही ‘भारतीय भाषाओं से गढ़वाली भाषा का सह-संबंध’ विषय पर व्याख्यान का आयोजन हुआ जिसमें मुख्य वक्ता के रूप में उत्तराखंड भाषा संस्थान के पूर्व सदस्य प्रसिद्ध भाषाविद और साहित्यकार डॉ सुशील कोटनाला जी उपस्थित थे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया ।

विश्वविद्यालय की राजभाषा प्रकोष्ठ की समन्वयक और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो० गुड्डी बिष्ट पँवार ने कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए सर्वप्रथम विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर श्रीप्रकाश सिंह का हार्दिक आभार व्यक्त किया जिनके कुशल मार्गदर्शन में हिंदी राजभाषा पखवाड़ा कार्यक्रम संचालित हो रहा था । साथ ही प्रोफेसर मोहन सिंह पंवार संकायाध्यक्ष भर्ती एवं प्रोन्नति का भी आभार व्यक्त किया जिनका अमूल्य सहयोग समय-समय पर मिलता रहा है । पखवाड़े के दौरान विशेष सहयोग के लिए प्रो० गुड्डी बिष्ट पँवार द्वारा प्रोफेसर सीमा धवन, डॉ राकेश नेगी, डॉ अमरजीत परिहार एवं डॉ बालकृष्ण बधानी का हार्दिक आभार व्यक्त किया गया । आमंत्रित अतिथियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि यदि भाषा गुलाम होगी तो देश भी गुलाम होगा अत: अपनी भाषा को बचाने का समय आ गया है। साथ ही प्रो०बिष्ट ने हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों के प्रोत्साहन पर भी बल दिया।

विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो० ओ० पी० गुसाईं ने अपने उद्बोधन में विश्वविद्यालय में चलाए गए हिंदी में हस्ताक्षर अभियान की सराहना करते हुए मातृभाषा गढ़वाली न बोलने पर चिंता व्यक्त की । परिसर निदेशक चौरास प्रो० आर० एस० नेगी ने गढ़वाली में बोलने पर बल देते हुए कहा कि गढ़वाली भाषा को हमें घर से ही शुरू करना चाहिए।

मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित पूर्व सदस्य (उत्तराखंड भाषा संस्थान) डॉ सुशील कोटनाला ने ‘भारतीय भाषाओं से गढ़वाली भाषा का सह-संबंध’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि हिंदी अपनी प्रारंभिक काल (वीरगाथाकाल) में जब प्राकृत और अपभ्रंश के निकट थी तब गढ़वाल में गढ़वाली राजभाषा थी। उन्होंने भाषाओं की विविधता को समृद्धि का सूचक बताते हुए भारतीय भाषाओं के शब्दों की गढ़वाली में उपलब्धता पर प्रकाश डाला। विवि के कुलसचिव प्रो० राकेश ड्योढ़ी ने अपने उद्बोधन में कहा कि मातृ भाषा में अपनापन है । हमारे पास जो बच गया है वह हमारी धरोहर है। उसे बचाने का प्रयास करना चाहिए।

अतिथियों के उद्बोधन के उपरांत हिंदी पखवाड़े में आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता कर्मचारियों और छात्र छात्राओं को पुरस्कार और प्रमाण पत्र वितरण किये गये । कार्यक्रम के अंत में राजभाषा प्रकोष्ठ की समन्वयक और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो गुड्डी बिष्ट पँवार ने धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम के समापन की घोषणा की। 

इस अवसर पर कार्यक्रम में डॉ संजय पाण्डेय (उप निदेशक लोक कला और संस्कृति निष्पादन केन्द्र),श्री सूरज प्रसाद (अनुवादक राजभाषा), डॉ बालकृष्ण बधानी, डॉ अमरजीत परिहार, डॉ नवीन चन्द्र भट्ट,  डॉ आकाशदीप, शोधार्थी राकेश सिंह, तुषार माहन, कोमल , प्रमोद उनियाल, शुभम् थपलियाल, शिवानी, पंकज सिंह, विकास यादव, शालिनी , मुरारी और हिंदी विभाग के अन्य शोधार्थी और छात्र छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ सविता मैठाणी ने किया।