Uttrakhand festival


मनुष्य और प्रकृति के बीच आस्था की अनूठी परंपरा को समेटे हुए है अंयार पूजा (ग्वाल पूजा)

द्वारिका चमोली (डीपी)

उत्तराखंड में मनुष्य जीवन की शुरुआत ही प्रकृति से होती है यही कारण है कि उनका प्रकृति के साथ एक गहरा रिश्ता बन जाता है। अपने जीवन के साथ साथ ये लोग पालतू पशुओं का भी विशेष ध्यान रखते है क्योंकि उनके साथ इनका मानवता का अटूट बंधन होता है। यहां होने वाली पूजाओं में भी प्रकृति में विचरित करने वाले प्राणियों का योगदान रहता है। 

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कृषि प्रधान राज्य होने की वजह से ये लोग पशुओं को भी पूरा मान सम्मान देते हुए उनके स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते हैं। इसका पता इस बात से चलता है कि बसंत समाप्त होने के बाद जेष्ठ महीने में यहां के लोग अपने पशुओं की रक्षा के लिए एक पूजा करते हैं जिसे “अंयार पूजा” या “ग्वाल पूजा” कहा जाता है। 

इस पूजा में आस्था के साथ कहीं न कहीं विज्ञान का रहस्य भी छुपा है। यह तो सर्वविदित है कि बसंत के आगमन के समय पतझड़ के बाद पेड़ पौधों के रूखे सूखे पत्ते झड़कर उनमें नई–नई कोंपलें व रंग विरंगे फूल खिलने लगते हैं। प्रकृति की यह छटा देखने में भले ही हमें आकर्षक लगती है लेकिन एक सच यह भी है कि  ऐसे वक़्त प्रकृति में कई तरह के विषैले तत्व भी मौजूद होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी बसंत ऋतू के वक़्त अंयार, बांज, बुरांश, खड़ीक, क्विराल इत्यादि के बृक्षों की हरी घास मवेशियों को देना वर्जित होता है। इस मौसम की हरी घास जानवरों के लिए जहर मानी गई है इसीलिए पशुओं की रक्षा के लिए गांव के लोग पूजा अर्चना करते हैं ताकि उनके पशु इस जहरीली घास के विष से बच सकें। चैत्रमास की फूलदेई त्यौहार के पश्चात अंयार पूजा (ग्वाल पूजा) के दिन से मवेशियों को सभी प्रकार की घास देना शुरू कर देते हैं।

कैसे होती है ये अनूठी पूजा 

अंयार पूजा (ग्वाल पूजा) के लिए ग्रामीण लोग ग्वाल बाल के साथ चैत्र माह की 30 गते को अपने-अपने खेतों में जाकर जिसके जितने पशु होते हैं उतने पत्थर (गारे) एकत्रित कर काली दाल और चांवल के साथ मिलाकर अंयार के पेड़ के पत्ते पर बांध कर रख दिया जाता है फिर एक बच्चे को बाघ बना दिया जाता है बाघ बना बच्चा उस पोटली को जानवरों के ऊपर से घुमाकर एक पेड़ पर बांध देता है। इसके बाद ज्येष्ठ माह की 30 गत्ते को बाघ बना ग्वाला उस पोड़ली को निकलता है और सभी ग्रामीण उसे लेकर एक नदी के तट पर एकत्रित होते हैं। 

नदी के छोर पर सभी ग्रामीणों की गारे की पोटली का विधिवत पूजा की जाती है और साथ ही मेरे पशुओं को कोई विष न लगे कहकर नदी में प्रवाहित किया जाता है। इस पूजा आयोजन में वकायदा पूरी-पकौड़ी खीर हलवा इत्यादि के रूप में प्रसाद बनाया जाता है जो बाघ बने ग्वाले के अलावा वहां उपस्थित सभी लोगों में वितरित किया जाता है। वहां उपस्थित सभी लोग हंसी-ठिठोली के साथ बड़े ही हर्षोल्लास के साथ नाचते-गाते हैं और फिर अपने अपने घरों को प्रस्थान करते हैं। 

यह पूजा मनुष्य और प्रकृति के बीच एक अनूठी परंपरा है जो आपसी सहयोग व प्रेम को बढ़ावा देती है। 

आज बेसक उत्तराखंड से लोग पलायन कर गए हों किंतु वहां रहने वाले लोग आज भी इस परंपरा को जीवंत किये हुए हैं।