हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला औषधीय फल भमोरा (Cornus Capitata) 

देवभूमि उत्तराखंड अपने आप में स्वर्ग से कम नहीं क्योंकि यहां देव शक्तियों के साथ साथ अनेकों ऐसी जड़ी बूटियां, और फल-फूल हैं जो मानव जीवन के अति उपयोगी होने के साथ साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखते हैं। यहां के अधिकतर भूभाग में जंगल होने की वजह से प्रकृति ने इसे बेस कीमती प्राकृतिक धन संपदा से संजोया है। 

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विश्वभर में पाए जाने वाले आठ हज़ार पौधों की प्रजातियों में लगभग चार हज़ार प्रजातियां अकेले उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में होने का अंदेशा है लेकिन प्रदेश की सरकार ने कभी भी इसका उचित सदुपयोग नहीं किया। 

आज आपको उत्तराखंड के जंगलों में पाए जाने वाले एक ऐसे फल से  परिचित कराने जा रहे है जिसे स्थानीय भाषा में भमोरा (बमौरा) के नाम से जाना जाता है इसका बायोलॉजिकल नाम Cornus Capitata है। यह भूमितल से 1000 से लेकर 3000 मीटर की ऊंचाई वाले स्थानों में पाया जाता है और वर्ष में सितंबर से नवंबर महीने के मध्य पकता है। शुरुआत में यह कुछ हरा रंग लिए होता है लेकिन पकने के बाद स्टॉबेरी की तरह लाल दिखाई देता है और शायद इसी कारण इसे हिमालयन स्ट्रॉबेरी  भी कहा जाता है। यह अनेकों औषधीय गुणों को लिए हुए बहुत ही स्वादिष्ट फल है। वैसे तो यह सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्रों जैसे- भारत, नेपाल, चीन, आदि में देखने को मिल जाता है किंतु इसका उद्भव चीन और भारत के उत्तरी हिमालय में ही माना जाता है। भमोरा रिहायशी इलाकों में बिरला ही मिले लेकिन जंगलों में आज भी देखने को मिल जाता है। उत्तराखंड में रहने वाले लोग अक्सर जानवरों को चराने जंगलों में लेकर जाते है और वहीं वे इस स्वादिष्ट फल का रसास्वाद लेना नहीं भूलते। शहरों में पैदा हुए अधिकतर युवाओं ने तो इनका नाम भी नहीं सुना होगा।  

औषधिय गुणवत्ता लिए भमोरा का कई  रोगों की औषधियों में प्रयोग किया जाता है जैसे- अतिसार, मूत्ररोग, फ्लू, खांसी के साथ साथ लिवर और किडनी को भी सुचारु रूप से दुरस्त रखने में। अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इसकी छाल और पतियों में मौजूद टेनिन जो कि एस्ट्रिजेंट के रूप में दर्द और बुखार का निवारण करता है, प्रयुक्त मात्रा में पाया जाता है यही कारण है कि फार्मास्यूटिकल उद्योग में औषधीय निर्माण हेतु इसको उपयोग में लिया जाता है। इसमें मौजूद प्रोटीन 2.58 प्रतिशत, फाइबर 10.43 प्रतिशत, वसा 2.50 प्रतिशत पोटेशियम 0.46 मि० ग्रा० एवं फासफोरस 0.07 मि० ग्रा० प्रति 100 ग्राम में पाए जाते है। इससे  इसकी पौष्टिक गुणवत्ता का पता चलता है।  

उत्तराखंड में पाए जाने वाले भमोरा व अन्य अनेकों फल व गुणकारी बनस्पतियां जंगलों में उगती है लेकिन पर्याप्त जानकारी न होने से अधिकतर स्वतः ही नष्ट होने के कगार पर है और जिनके विषय में जानकारी है उसके लिए मार्किट न मिलने से ख़राब हो जाती है। कुछ वर्षों से जंगलों में भयंकर आग के चलते भी अनेकों कीमती जंगली बूटियां बर्बाद हो गई। यदि सरकार ऐसी बनस्पतियों पर ध्यान देकर वैज्ञानिक अध्ययन करके सरक्षण कर रोजगार से जोड़े तो इससे लोगों का आर्थिक स्तर भी सुधरेगा और ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी और इन गुणकारी जंगली उत्पादों को विश्वभर में पहचान भी मिलेगी। 

हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाले अनेकों ऐसे फल है जो पहले पहल मुसाफिरों और चरवाहों की भूख को शांत करते थे लेकिन बक्त के साथ जब लोगों को इसका महत्व समझ आया तो ये लोक जीवन का हिस्सा बन गए। 

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