खुशहाली और प्रकृति को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व “घी त्यार” 

हिमालय की गंगनचुंबी चोटियों, पर्वत श्रृंखलाओं, पावन नदियों, तालाबों, झीलों के बीच और सबकी बिगड़ी मिटाने वाले भगवान शिवजी की धरती पर बसा है उत्तराखंड। यहां के कण कण में भोले भंडारी विराजमान है और यही कारण है कि इस पावन धरती पर भोलेनाथ की पूजा अधिक की जाती है।  प्राकृतिक छटा लिए इस प्रदेश के लोगों की आजीविका के साधन भी प्रकृति से ही जुड़े हुए है जिस कारण से ये लोग प्रकृति से  बहुत लगाव रखते है और उससे संबंधित त्यौहारों को बड़ी धूम धाम से मनाते है।  ऋतुओं और फसलों पर आधारित यहाँ अनेकों त्यौहार है जिनमें हरेला और घी संग्रान प्रमुख है।  हरेला फसलों की बुवाई के समय और घी संग्रान फसलों में बाली आने की ख़ुशी में मनाये जाते है।  

उत्तरखंड के लोक जीवन में खेती का अहम् महत्त्व है क्योंकि पौराणिक समय से ही जल, जंगल, और जमीन से प्राप्त संसाधनों पर ही लोगों का जीवन निर्भर है और उसी सरचना के आधार पर इनका जीवन चक्र भी चलता रहता है। प्रकृति और सौर मासिय पंचांग के नियमानुसार जब सूर्य एक राशि से संचरण करते हुए जिस दिन दूसरी राशि में प्रवेश करता है उसे ही संग्रान या संक्रांति कहा जाता है। संग्रान प्रत्येक हिंदी माह की एक तारीख (गत्ते) को आती है जिसे यहां के लोकजीवन में शुभ माना जाता है और इस दिन सभी घरों में विशेष पूजा का चलन भी है । 

क्यों मनाया जाता है घी त्यार (त्यौहार)

जैसा कि ऊपर हम बता चुके है कि उत्तराखंड में  महीने की प्रत्येक संक्रांति को त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद (भादो) की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं चूंकि इस दिन सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करता है इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते है। इसे स्थानीय लोग घी संक्राति के रूप में मानते हैं। कहते हैं कि वर्षा ऋतु में लगाई गई फसलों में जब बालियां आने लगती है तो किसान अच्छी फसल की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं। अपनी ख़ुशी को जाहिर करने का उनका अपना एक अलग ही अंदाज़ है वे लोग नई फसल की बालियां लेकर अपने घर के मुख्य द्वार  के ऊपर बीचों बीच और दोनों ओर गाय के गोबर से चिपकाते है जिसका मकसत यही होता है कि हमारे घर अनाज के भंडार से भरे रहें।  

कहा जाता है कि वर्षा ऋतू में पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलाने लगती है और विभिन्न प्रकार के फलों  के बृक्षों पर भी फल तैयार होने लगते है। स्थानीय लोगों का मानना है कि अखरोट का फल घी त्यार के बाद ही खाया जाता है इसके अलावा इन दिनों जंगलों में घास फूस भी अच्छी होती है जिसकी वजह से जानवरों को भी भरपूर और पौष्टिक चारा मिल जाता है जिसकी वजह से घर घर में घी दूध की मात्रा प्रचुर मात्रा में मिलती है इसी ख़ुशी में घी त्यार मनाये जाने की परंपरा है।  यदि किसी के घर में घी नहीं है तो गांव के लोग उनके घर में घी पहुंचाते है। 

क्यों खाया जाता है इस दिन घी 

लोक जीवन से जुडी हर जगह की अपनी अपनी लोककथाएं भी होती है। उत्तराखंड में इस त्यौहार के दिन घी खाने के पीछे का एक कारण उनके मन का भय भी है  और वो भय है घनेल, घोंघा (snail) का। कहते है कि जो व्यक्ति घी सक्रांति के दिन घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में घनेल, घोंघा (snail) बनता है। इसी भय की वजह से नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुओं में भी घी लगाया जाता है। 

प्रकृति प्रेम के इस त्यौहार के दिन हर घर में भिन्न भिन्न प्रकार के पकवान बनाए जाते है लेकिन भरवा रोटी जिसे बेडु की रोटी  भी कहते है और अरबी के पत्तों की सब्ज़ी (पत्यूड़)विशेष तौर पर बनाई जाती है जिन्हें घी में डुबोकर खाया जाता है। एक पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाने से मनुष्य की ग्रहों के अशुभ प्रभावों से रक्षा होती है।  कहा जाता हैं कि घी का सेवन उनके जीवन में राहू केतू का जो अशुभ प्रभाव होता है वो नहीं पड़ता। वहीं आयुर्वेद के अनुसार बरसात में त्वचा संबंधी कई रोग इन दिनों हो जाते है ऐसे में देशी घी का प्रयोग इनसे बचाव में काफी कारगर है। घी को सिर पर रखने से खुश्की नहीं होती और चिंताओं से मुक्त हो मन को सकून मिलता है, बुद्धि तीव्र होती है साथ ही कफ, पित दोष दूर होकर शरीर बलिष्ट होता है।


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