उत्तराखंड में आशा कार्यकर्ति संघ की मांगों के समर्थन में पहले दिन से ही साथ है सामाजिक कार्यकर्ता सागर भंडारी 


देहरादून : पिछले दो महीने से अपनी 12 सूत्री मांगों को लेकर प्रदेशभर में आशा कार्यकर्तियाँ हड़ताल पर है। 2006 में आशाओं को मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नियुक्त किया गया था लेकिन उसके बाद इन पर लगातार विभिन्न कार्यों का अतिरिक्त बोझ भी डाल दिया गया किंतु उसके बदले भुगतान नहीं दिया गया। आशाओं का कहना कि यदि काम बढ़ाया गया है तो हमें उसका भुगतान भी उसी हिसाब से दिया जाना चाहिए। 

करोना काल के दौरान इन्हे एक्टीव सर्वे का कार्यभार सौंपा गया था जिसे इन्होने वखूबी निभाया भी लेकिन उनको भुगतान समय पर नहीं दिया जा रहा है।  संघ के नेताओं का कहना है कि हम सब जोखिम में काम कर रही हैं इस नाते हम चाहते हैं कि उन्हें राज्य कर्मचारी घोषित कर स्कीम वर्कर के तहत निश्चित मानदेय दिया जाए जिसकी हम लंबे समय से मांग कर रहे हैं और करोना काल में दस हज़ार रूपये भत्ते दिए जाने की भी कई बार मांग उठा चुके है और इसके लिए विभागीय अधिकारीयों एवं नेताओं के चक्कर काट कर एवं इस बावत कई ज्ञापन देकर थक चुके हैं जिस वजह से हमें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ा है। 


आशाओं की जायज़ मांगों का कई सामाजिक कार्यकर्ता भी लगातार उनका समर्थन कर रहे है। सामाजिक कार्यकर्ता सागर भंडारी ने बताया कि वो पहले दिन से अपनी इन बहनों के साथ हैं और उनकी मांगों को लेकर विभागीय अधिकारीयों और सरकार के नुमाइंदों से मिल चुके हैं  लेकिन कोई भी समाधान मिलता नज़र नहीं आ रहा है।  हालाँकि मुख्यमंत्री धामी ने आशाओं के बढ़ते दबाव को देखते हुए उन्हें पांच महीने तक 2000/- रूपये सहायता राशि देने की घोषणा कि है लेकिन अन्य मांगों को लेकर उन्होंने भी मौन साध लिया है। आशा कार्यकर्ताओं ने सरकार पर अपना आर्थिक शोषण करने का आरोप लगाया और कहा कि  उनकी मांगों के प्रति सरकार बिलकुल भी गंभीर नज़र नहीं आ रही। 

ये है आशाओं की मुख्य मांगे 

सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए 

न्यूनतम 21000/- रूपये मानदेय दिया जाए 

मानदेय मिलने तक मासिक वेतन निर्धारित किया जाए 

सेवनिर्वित पर हो पेंशन का प्रावधान 

कोविड कार्यों में लगी सभी आशा वर्करों को 10000/- रूपये मासिक करोना भत्ता 

50 लाख का जीवन बीमा एवं दस लाख का स्वस्थ्य  बीमा लागू किया जाए 


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