भंगजीरा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित हो सकता है

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य अपने स्वास्थ्य के लिए न जाने क्या क्या तरीके अपना रहा है किंतु शरीर को स्वस्थ और तंदुरस्त रखने के लिए प्रकृति ने जो अनमोल चीजें हमें दी है उससे दूरी बना जंक फ़ूड से रोगों को बुलावा दे रहा है। कभी भारतवर्ष के गांव मोटे अनाज के पौष्टिक और स्वादिष्ट पकवानों से जाने जाते थे लेकिन गांवों का शहरीकरण होने से ये पौष्टिक पकवान भी धीरे धीरे समाप्ति की कगार पर हैं। अब में उत्तराखंड की बात  करूं तो वहां खतपतवार के रूप में ही अनेकों ऐसे अनमोल अनाज की प्रजातियां है जिनका औषधीय रूप में प्रयोग होने के साथ साथ भोजन के लिए भी उपयोग किया जाता है। भंगजीरा भी उन्हीं में से एक है जो खतपतवार के रूप में होता है लेकिन वहां लोग कम मात्रा में इसकी खेती करते है। 

भंगजीरा, भंगीरा या भंगजीर जिसका वानस्पतिक नाम (Perilla frutescens ) है और lamiaceae  कुल से संबंध रखता है। इसको सिलाम, मिजो, शीसो आदि नामों से भी जाना जाता है।  यह हिमालय क्षेत्र की पहाड़ियों विशेषकर उत्तराखंड में 700-1800 मीटर की ऊंचाई वाले स्थानों पर होता है और इसका पौधा लगभग एक मीटर लंबाई लिए होता है। गढ़वाल में इसे भंगजीरा तो कुमाऊं में झूटेला के नाम से जाना जाता है और आमतौर पर इन इलाकों में इसे चटनी के रूप में ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है और मवेशियों को भी चारे के रूप में दिया जाता है । भंगजीरा भारत के अलावा पूर्वी एशिया में चीन जापान और कोरिया के पर्वतीय इलाकों में भी पाया जाता है।  उत्तराखंड में आप देखेंगे कि यह हरे और बैंगनी दो तरह के रंगों के पत्ते लिए हुए होता है। इसके पत्तों को मसालों के साथ पीसें तो उनके स्वाद में इज़ाफ़ा होता है और इनकी चटनी भी बहुत ही पौष्टिक एवं स्वादिस्ट होती है। इसके बीजों को भूनकर बुखने  के रूप में और पकोड़े में तिल की तरह चिपका कर खाते है साथ ही कुछ मसालों में भी इसको मिलाया जाता है। भंगजीरे के बीजों की चटनी को भी भांग के बीजों की चटनी की तरह बनाया जाता है।  यही नहीं इसके बहुत सारे औषधीय गुण भी है। यह मृत पड़ी कोशिकाओं को हटाने के साथ साथ कैंसर, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल, डॉयबिटीज, खांसी, मानसिक रोग, एलर्जी जैसी बिमारियों में बहुत ही फायदेमंद होता है।

उपरोक्त रोगाणुरोधी गुणों की विभिन्नताओं के कारण इसके पौधे में एक अति विशिष्ट गंध होती है  जिसके आवश्यक घटक तत्व इसके पोषण को प्रभावित करते है और इसे औषधीय गुणों में परवर्तित करते हैं।  वैज्ञानिकों के मतानुसार भंगजीरा का प्रयोग कॉड लीवर आयल की तुलना में अधिक सुरक्षित है। अन्य वसीय तेलों में हानिकारक तत्व जैसे पारा इत्यादि के होने से मानव शरीर को नुकसान पहुंचने का खतरा बना रहता है। इसका तेल पूर्ण रूप से शाकाहारी होने के साथ साथ बेहद ही लाभकारी है। विश्वभर में इसके इसेंसियल आयल की बेहद मांग है यही कारण है कि इसका उत्पादन भी बहुतायत में किया जाता है। भंगजीर में 0.3 से 1.3 प्रतिशत इसेंसियल आयल पाया जाता है। शाकाहारी व्यक्तियों के लिए यह बहुत ही लाभकारी हैं क्योंकि मांस मछली में पाया जाने वाला ओमेगा 3 व 6 इसमें काफी मात्रा में पाया जाता है।  ओमेगा 3 की मात्रा जहां 54 -64 प्रतिशत है तो ओमेगा 6 की मात्रा 14 प्रतिशत है। लिपिड की मात्रा लगभग 38 -45 प्रतिशत, कैलोरी 630 किलो किलो, प्रोटीन 18 . 5 ग्रा. वसा 52 ग्रा. कार्बोहाइड्रेट्स 22 . 8 प्रतिशत, कैल्शियम  249 . 9 मि. ग्रा., मैग्नीशियम 261 . 7 मिली. ग्रा. जिनक 4 . २२ मिली. ग्रा.तथा कॉपर 0 . 20 मिली. ग्राम. की मात्रा प्रति 100 ग्राम तक पायी जाती है। 

पूरे विश्वभर में भंगजीर का प्रयोग फूड, फार्मा, पर्सनल केयर तथा पेंटस आदि के उद्योगों में किया जाता है और वर्तमान समय में इस पर वैज्ञानिकों द्वारा अनेकों प्रकार के शोध कार्य किए जा रहे हैं। मानवजीवान के लिए बहुत ही कल्याणकारी होने के कारण वैज्ञानिक भी कह रहे है कि यदि उत्तराखंड सरकार इसकी खेती को बढ़ावा दे तो भंगजीरा वहां के लोगों की आर्थिकी के लिए वरदान साबित हो सकता है। 

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