साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रयोग में उपयुक्त होने वाला बृक्ष -भोजपत्र 

भारत के हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले दुर्लभ वृक्ष भोजपत्र को  शायद आज की पीढ़ी न जानती हो लेकिन इतिहास के जानकारों के जेहन में ये आज भी अपनी छाप छोड़े होगा। भोजपत्र को संस्कृत में भूर्ज कहा जाता है।  जब कागज का अविष्कार नहीं हुआ था तब लिखाई का कार्य अक्सर इसी बृक्ष की छाल पर किया जाता था। उस युग में पत्र व्यवहार, राजशाही संदेश, जन्मपत्री, कुंडली, विवाह का न्यौता इत्यादि इसी बृक्ष की छाल में लिखकर दिया जाता था यही नहीं मानव ने अपने अंगों को  छुपाने के लिए इन्ही छालों को अपने तन पर लपेटा था और इन्हीं छालों में सामूहिक भोज भी किया जाता था और शायद इसीलिए यह भोजपत्र कहलाया।

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प्राचीन काल के तमाम साहित्य इसी भोजपत्र पर लिखे गए थे और जो देश विदेश के संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित हैं। 

भारतीय संस्कृति के लिए अहम

भारतीय संस्कृति में इस बृक्ष को मंगल के प्रतिक के रूप में माना जात्ता है क्योंकि तंत्र मंत्र में विनाशकारी शक्तियों एवं प्रेतात्माओं से उत्पन्न बाधाओं से बचने के लिए भोजपत्र पर मंत्र को लिखकर उसे ताबीज के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इस बृक्ष पर परत दर परत लिपटी होती है जिसे प्राकृतिक वस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। 

भोजपत्र का वृक्ष कहीं कम ऊंचाई वाला तो कहीं बड़े आकार के होते हैं। वैसे तो इसकी चार किस्में हैं किंतु हिमालय क्षेत्र में इसकी दो किस्में ज्यादा पाई जाती है। एक बेटुला उटिलिस और दूसरी बेटुला एल्योयडिस। इसका दुग्धवर्ण सबसे उत्तम होता है जो गढ़वाल में गंगा नदी के उद्गम क्षेत्र में पाया जाता है। इसकी छालें पेड़ को छोड़कर लटकी हुई रहती है। प्रकाश की किरणें पड़ने पर यह खूबसूरत दिखाई देता है। जून माह में जब यह पत्तों और पुष्पों से भर जाता है तब इसकी गुलाबी रंगत और भी बढ़ जाती है। 

समय के साथ अपने फायदे के लिए इसकी अंधाधुंध कटान से आज यह वृक्ष व्यवसायिक कुदृष्टि का शिकार हो गया है। अब हाल ये है कि इसके जंगल के जंगल गायब हो चुके है  और वहां वियावान पहाड़ नज़र आते हैं। गंगोत्री से आगे गोमुख ग्लेशियर के बीच भोजपत्र का जिस तरह से नश्तो नामूद किया है वह बहुत ही घिनोना और शर्मनाक है। जहाँ कभी भोजपत्र के पेड़ों का जमघट दिखाई देता था वह भोजवासा पड़ाव तो अब नाम मात्र का ही रह गया है। पर्यावरण व  सांस्कृतिक दृष्टिकोण से इस दुर्लभ वृक्ष का विनाश बहुत ही चिंताजनक है। 













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