किशोर अवस्था में काखड़ी चोरी का एक वृतांत 

द्वारिका प्रसाद चमोली
आप महानगरों में कहीं भी हों पर आज भी आपने अगर अपना बचपन गांव में बिताया है तो वो आपको जरूर कचोटता होगा और वो सुनहरी यादें आपको फिर उसी माहौल में लौटने को मजबूर करती होंगी। बचपन का नाम ही नादानियाँ है जिन्हें देखकर हर कोई आनंदित होना चाहता है किंतु दर्शाता नहीं क्योंकि वो नादानियाँ मन को गुदगुदाने के साथ साथ हमें भी अपने स्वयं के बचपन में ले जाती है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति ने अपने बचपन में कुछ न कुछ ऐसी नादानी की होती है जो जीवन पर्यन्त उसके साथ रहती है ऐसी ही अपनी एक नादानी आपके बीच साँझा कर रहा हूं जो हमने किशोरावस्था में की थी।
गांव के वातावरण में न जाने ऐसा क्या जादू है कि आप अपने चौक में छांव में यदि पत्थर पर भी लेटे है तो एक सुकून मिलता है ऐसा ही मेरे साथ भी हो रहा था। एक तरफ नंदा देवी का मंदिर और दूसरी ओर अपने मकान की छाँव में बैठा मैं सामने हरी भरी पहाड़ियों व नदी की कलकल करती ध्वनि में खोया था कि मेरी एक बुआ जो कि उम्र में मुझसे छोटी थी और मुझे भैजी कहकर ही पुकारती थी ने एकदम से आवाज देकर मेरी तन्द्रा को तोडा और कहने लगी कहाँ खोये हो, कब से में यहां खड़ी हूं और तुम्हे पता ही नहीं चला मैंने कहा कहो कुछ काम था तो कहने लगी आज काखड़ी (खीरा) खाने का मन कर रहा है पर तुम्हारा साथ चाहिए मैंने कहा काखड़ी कहाँ से आएगी (क्योंकि हमारे गांव में काखड़ी बहुत ही कम हुआ करती थी) तो उसने कहा कि वो पला खोला की बड़ी जी है न नीचे उनके खेत में है वही से ले आते है मैंने कहा पर वो गुस्सा होंगी कहने लगी कुछ नहीं होता बस तू यहाँ बैठकर नज़र रखना मैं अभी यूँ गई और यूँ आई इतना कहते ही वो तेजी के साथ नीचे खेतो की और दौड़ पड़ी ये उम्र ऐसी कि किसी चीज का डर भय कुछ नहीं बस अपने टारगेट को भेदना था यही उसने किया और कुछ ही पलों में उसके हाथों में काखड़ी थी जो वो नीचे गौशालाओं के पास खड़ी होकर मुझे दिखा रही थी अभी वो कुछ कहना ही चाहती थी कि इतने में मेरी दादी आ गई और उन्होंने उसके हाथ में वो काखड़ी देख ली इससे पहले कि वो कुछ बोलती मैंने जल्दी से उन्हें चुप रहने को कहा और उन्हें रिश्वत के रूप में काखड़ी में हिस्सा देने की बात की तो उनके मुँह में भी पानी आ गया और वो भी इस चोरी में हमें सहयोग देने को सहर्ष तैयार हो गई फिर मैंने उनसे घर्या नमक लिया और उन्ही की गौशाला में जाकर हम तीनों ने काखड़ी खाई और फिर वापिस उसी चौक में आकर बैठ गए और बातों में मशगूल हो गए थोड़ी देर बाद देखता हूँ तो जिनके खेत की हमने काखड़ी खाई थी वो आती दिखाई दी मैंने बुआ को कहा पला खोला की दादी अब तेरी सामत बनाती है खैर हम सब नॉर्मल बने रहे वो भी मेरी दादी ही लगती थी उनसे भी थोड़ी देर बात करते रहे और कहा कि ये दाथुली (दरांती) लेकर कहां जा रही हो तो उन्होंने कहा कि कल वो नीचे खेत में गई थी तो वहां एक काखड़ी खूब बड़ी हो गई है अब कोई उसे चोरी न कर ले इसलिए उसे ही लेने जा रही हूं। अब उन्हें क्या बताएं कि आपने देरी कर दी और काखड़ी तो चोरी हो गई खैर हमने अनजान बनकर उन्हें जल्दी से काखड़ी लाने की बात कही उनके वहां से जाते ही हम एक दूसरे को देख मन ही मन मुस्कुराने लगे। हमें डर था कि हमारी दादी कुछ न बता दे इसलिए हमने दादी को कहा कि वो जब खेत से ऊपर आएंगी तो तुम चुप रहना पर जैसे हमें अंदेशा था दादी ने वैसा ही जवाब दिया कि में सब कुछ बता दूंगी ये सुनकर हमने यहाँ पर कूटनीतिक चाल चली और उन्हें कहा कि तुमने अगर मुंह खोला तो हम उन्हें कह देंगे कि इस दादी ने हमें कहा था और इन्ही की गौशाला में हमने काखड़ी खाई थी और उनको वहां पड़े काखड़ी के बीज भी दिखा देंगे बस फिर क्या था हमारी दादी जी सहम गई। हमारी अभी इतनी बात चल ही रही थी कि जो तूफान आना था उसकी आहट सुनाई देने लगी पला खोला दादी की खेत में से ही भारी भरकम गालियों की आवाज धीरे धीरे हमारे कानों के करीब आने लगी और चौक में आते ही जो गालियों की बरसात हुई उसमें मैं और बुआ जी मंद मंद मुस्कुराते हुए भीजते रहे।

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