उत्तराखंड में मनाया जाने वाला लोकपर्व घी संगरांद/घी त्यार 

द्वारिका चमोली (डीपी)

यूं तो उत्तराखंड में प्रत्येक महीने की संक्रांति को त्योहार के रूप में मनाया जाता है। किंतु भाद्रपद (भादो) महीने की संक्रांति के दिन सूर्य, सिंह राशि में प्रवेश करता है  इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। उत्तराखंड में इसे घी संगरांद या घी त्यार के रूप में जाना जाता है। 

उत्तराखंड के अधिकतर त्यौहारों की तरह यह भी प्रकृति और पशुओं से जुड़ा है। भादों  माह में धूप अच्छी खिलती है जिससे फसलों में बालियां आने लगती है। किसान अच्छी फसल की कामना के लिए यह त्यौहार मानते हैं। इस दिन लोग इन फसलों की बालियों को गोबर के साथ अपने घरों के मुख्य द्वार के ऊपर लगाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से घर में धन धान्य की बरकत रहती है। 

वैसे तो घी स्वास्थ्य के लिहाज़ से बहुत ही लाभकारी है और फिर शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों के लिए तो यह अति आवश्यक होता है। चूँकि उत्तराखंड में पूर्व में लोग शारीरिक श्रम से ही अपनी आजीविका चलाते थे लेकिन घी संक्रांति के दिन घी खाने के पीछे एक डर भी छुपा हुआ है। पहाड़ों में यह बात मानी जाती है कि जो व्यक्ति घी संक्रांति के दिन इसका सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में घनेल (Snail) बनता है ।और इसी डर की वजह से ही नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है। 

यह त्यौहार न केवल प्रकृति, पशुपालन बल्कि भाई चारे की भी मिशाल देता है। इस दिन हर घर में घी खाना अनिवार्य होता है यदि किसी व्यक्ति के पास दुधारू पशु न होने के कारण घी उपलब्ध नहीं है तो पूरे गांव के लोग थोड़ा थोड़ा दूध-घी उनके यहां दे जाते हैं और उसे घी त्यौहार की बधाइयाँ देते हैं। 




घर गांव की दिशा-ध्याणीयां भी इस दिन अपने मायके आती हैं जिस वजह से माहौल और भी खुशनुमा बन पड़ता है। इस उत्सव के माहौल में घरों में उड़द की दाल को पीसकर आटे में मिलाकर भरवा रोटी बनाई जाती है जिसे घी में डुबोकर खाया जाता है। इसके अलावा पूरी, पकौड़ी, खीर हलवा जैसे स्वादिष्ट पकवानों के साथ स्थानीय ताज़ी लोंकी, कद्दू, तोरी, चिचिंडा इत्यादि की सब्ज़ियां बनाकर उनको चखा जाता हैं। 

परन्तु सबसे पहले ये सभी चीज़ें एक थाली में रखकर पितृ देवताओं के लिए अलग से रख दिया जाता है। माना जाता है कि पितृ देवता इस दिन अपने वंशजों के घर आकर अपने लिए रखे भोजन को ग्रहण कर उनको अपना आशीर्वाद देते हैं। 

हालांकि समय के साथ अब उत्तराखंड के गांवों से भी लोगों के पलायन के कारण बड़ी संख्या में खेती और पशुपालन समाप्ति की कगार पर है किंतु जो लोग  आज भी अपने अपने गांवों में है वो अपनी  संस्कृति और पहचान को बचाने में प्रयासरत हैं। उनके ज़ज़्बे और प्रयास को नमन करते हुए हम समस्त उत्तराखंडी बंधुओं को घी संगरांद/घी त्यार की हार्दिक बधाई देते हैं। 

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