महाभारत के खलनायक दुर्योधन की उत्तराखंड में होती है पूजा- जाने क्यों 

महाभारत के विषय में आप सभी जानते है और इसके हर पात्र से भी वाकिफ होंगे। इसमें एक अहम पात्र थे दुर्योधन जिसे अपने अहंकारी स्वभाव व इर्षा भाव  के कारण ही हम सभी दुष्ट प्रवर्ति का खलनायक ही मानते  है, लेकिन उसके अंदर भी कुछ गुण मौजूद थे। यदि शकुनि मामा अपने बदले के लिए बचपन से ही दुर्योधन को न भड़काते तो शायद दुर्योधन इतना बुरा न होता। उसके अंदर भी दया भाव व लोगों की मदद करने का ज़ज़्बा था यही कारण है कि उत्तराखंड के कुछ इलाकों में आज भी दुर्योधन की पूजा की जाती है।  

उत्तराखंड के लोगों के अनुसार एक बार दुर्योधन अपने मित्र कर्ण  के साथ घूमते हुए उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के नेतवार जगह से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर हर-की-दून नामक रोड के किनारे बसे सौर गांव में पहुंचे। उसका प्राकृतिक सौंदर्य उनको इतना भाया  की वो वहीं रहने लगे और स्थानीय लोगों की राक्षसों व जानवरों से रक्षा कर उनके सुख दुःख के भागीदर बने जिसका नतीजा ये हुआ कि लोग उनकी इज़त करने लगे और उन्हें देवता स्वरुप मानने लगे। करुक्षेत्र के युद्ध में उनकी मौत पर ये लोग बहुत दुखी हुए और उनकी याद में एक मंदिर का निर्माण किया। आज भी स्थानीय लोग न केवल उनकी पूजा करते हैं बल्कि उन्हें अपना क्षेत्रपाल भी मानते हैं।  

इस मंदिर के पीछे भी एक किवंदती है कि पाताल लोक के राजा भुब्रूवाहन द्वापर युग में कौरवों और पांडवों के बीच होने वाले युद्ध में कौरवों की मदद करना चाहता था किंतु कृष्ण ऐसा कदापि नहीं होने देना चाहते थे क्योकि उसके युद्धभूमि में आने से अर्जुन की पराजय हो सकती थी और ऐसे में सत्य पर असत्य की जीत हो जाती जिसका दुनिया में एक गलत संदेश जाता। इसी उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए कृष्ण ने भुब्रूवाहन के सामने एक शर्त रखी की यदि आप एक ही तीर से वृक्ष के सारे पत्ते भेद दोगे तो आप इस युद्ध में शामिल हो सकते हैं। उनकी इस शर्त को भुब्रूवाहन ने सहर्ष मान लिया और एक पल में ही बा छोड़ दिया लेकिन कृष्ण ने यहां कूटनीति का प्रयोग कर चालाकी से एक पत्ते को अपने पांव के नीचे दबा दिया अब तीर ने पेड़ के सारे पत्ते चीर दिए तो वो  कृष्ण के पांव की तरफ बढ़ा और कृष्ण ने अपना पांव पते से हटा दिया और भुब्रूवाहन से कहा की वो इस युद्ध में निष्पक्ष रहे।  इसका मतलव ये होता कि वो किसी भी तरह से इस युद्ध से दूर रहता जो कि भुब्रूवाहन को मजूर नहीं था और उसने कृष्ण की इस शर्त को नकार दिया इस पर भगवान कृष्ण ने सत्य की रक्षा के लिए उसका सर धड़ से अलग कर दिया लेकिन फिर भी भुब्रूवाहन ने इस युद्ध को देखने की इच्छा प्रभु के सामने रखी उसकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान कृष्ण ने उसका सर एक पेड़ पर टांक दिया जहां से वह महाभारत के युद्ध को देख सकता था। 

उत्तराखंड के लोगों के बीच मान्यता है कि पेड़ पर टांकने के बाद जब युद्ध हुआ और जब जब कौरवों की सेना की हार हुई भुब्रूवाहन वहीं से जोर जोर से चिल्लाता था और कौरवों को अपनी युद्ध रणनीति में बदलाव के लिए कहता था और जोर जोर से रोता था उसके इस करुण स्वर पर गांव के लोग भी इतना रोये कि कहते है उनके आसुओं से वहां एक नदी का उद्गम हुआ जिसे तमस या टोंस के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोग इस नदी को दुःख का प्रतीक मानते हैं और आज भी इसका जल नहीं पीते।  कहा जाता है कि भुब्रूवाहन आज भी  रोता है, चूंकि इस पाताललोक के राजा का दुर्योधन प्रशंसक और मित्र था इसलिए लोगों ने वहां दुर्योधन का मंदिर बनवाया तांकि दोनों मित्रों को लोग सदैव याद रख सकें। यहां के स्थानीय लोग अब भी उसकी वीरता को सलाम करते हैं और उसकी प्रशंसा में गीत गाए जाते हैं। दुर्योधन का मंदिर सौर गांव में, जबकि कर्ण का मंदिर सारनौल गांव में है। यही नहीं ये दोनों इस इलाके के क्षेत्रपाल भी बन गए। 

आप यहां सड़क मार्ग से बस, टैक्सी या अपने वाहन से आसानी से पहुँच सकते है।  देहरादून से लगभग 95  किलोमीटर और चकराता से ललगभग 69 किलोमीटर की दूरी पर नेतवार नामक स्थान है जहां से 12 किलोमीटर की दूरी पर हर-की-दून नामक सड़क के किनारे बसा है सौर गांव यही स्थित है दुर्योधन मंदिर। 

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