गींठी उत्तराखंड का ऐसा कंदमूल फल जो मूंह का स्वाद बढ़ाने के साथ शरीर को रखे स्वस्थ  

देवभूमि उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों में पलायन बहुत तेजी से हुआ है। जिस तेजी से पलायन बढ़ा है उसी तेजी से वहां की वन संपदा और भोजन की थाली से पहाड़ में उगने वाले कंदमूल फल जिसकी स्थानीय लोग सब्जी बनाते है भी अब गायब से हो गए है। ये कंदमूल फल न केवल स्वादिष्ट होते हैं अपितु शरीर को स्वस्थ रखने में भी सहायक होते हैं। 

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उत्तराखंड के जंगलों में विभिन्न प्रकार के कंदमूल फल होते है जिनको सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है इन्हीँ में एक है गींठी।  जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है कि ये एक गांठ की तरह का होता है।  इसके फल बेल में लगते है जो गुलाबी, भूरे और हरे रंग के होते हैं। आमतौर पर गीठीं के फल की पैदावार अक्टूबर से नवंबर महीने के दौरान होती है। 

गींठी का वानस्पतिक नाम डायस्कोरिया वल्बीपेरा और हिंदी नाम रतालू कंद, संस्कृत में इसे वराही कंद , वनालू, गृष्टि के नाम से जाना जाता है। यह अधिकतर दक्षिण पूर्व एशिया और अफ्रीका में पाया जाता है और पुरे विश्व में इसकी लगभग 600 प्रजातियां हैं। इसके अंदर मौजूद गुणों में मनुष्य शरीर की अनेकों बिमारियों को ठीक करने का मादा है यही वजह है कि इसे चरक संहिता व सुश्रुवा संहिता में 18 प्रमुख पौधों में स्थान दिया गया है। इसके अंदर फाइबर और विटामिन B 12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है एवं डॉयबिटीज़, कैंसर, कब्ज़, फेफड़ों के रोग, सांस रोग, चर्म जैसे रोगों में ये बहुत ही उपयोगी है।  

उत्तराखंड के जंगलों में ये वर्षों पहले से पाया जाता है और वहां लोग इसकी सब्ज़ी को खूब पसंद करते हैं क्योंकि ये स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पाचनक्रिया को भी दूरस्थ करता है और सांस व फेफड़ों को भी तरोताजा रखने में मदद करता है। इस  कंदमूल फल के औषधीय गुणों के कारण आज बाजार में इसकी डिमांड बहुत बढ़ गई है जिसे देखते हुए उत्तराखंड के कुछ एक स्थानों पर अब इसकी खेती भी होने लगी है।  ऐसी अनेकों वनस्पतियां जिनमे कि औषधीय गुण भी छिपे हैं आज के समय में जंक फ़ूड के चलते समाप्ति के कगार पर हैं। हमें व सरकारों को चाहिए कि इन बेसकीमती वनस्पतियों के सरक्षण के लिए कोई ठोस निति निर्धारण करें तांकि हमारे जीवन को जीवनदान देने वाली ये वनस्पतियों फिर से हमारे आस-पास मौजूद रहे । 

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