उत्तराखंड  : बाबा विश्वनाथ की नगरी उत्तरकाशी में पुस्तक लोकार्पण एवं काव्य महोत्सव





उत्तरकाशी :
अनघा फाउंडेशन और प्रभव साहित्य एवं कला मंच, उत्तरकाशी के संयुक्त तत्वावधान में 12 अक्टूबर 2025 को कलेक्ट्रेट ऑडोटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में शिक्षक, कवि और संस्कृतिकर्मी राघवेंद्र उनियाल जी की पुस्तक “तुझे लौटना होगा” का श्री सुरेश चौहान, विधायक, गंगोत्री, श्री रमेश चौहान,अध्यक्ष, जिला पंचायत, उत्तरकाशी, साहित्यकार व रंगकर्मी श्री महाबीर रवांल्टा, साहित्यकार व उत्तराखंड- सिने अभिनेता श्री मदन मोहन डुकलाण जी के करकमलों द्वारा विमोचन किया गया। 

मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभआरंभ किया। इसके उपरांत मंत्रोच्चारण के साथ राघवेंद्र उनियाल जी की पुस्तक ‘तुझे लौटना होगा’ का विमोचन किया गया। 

राघवेंद्र उनियाल जी ने उपस्थित अतिथियों एवं प्रबुद्ध दर्शकों का अभिनंदन करते हुए पुस्तक के विषय में कहा कि उनकी कविता पहाड़ से होते पलायन को देखते हुए उनके व्यथित हृदय की पीड़ा है। वे वीरान होते गॉंवों को देखकर परेशान हो जाते हैं और यही दर्द शब्द बनकर कविता के रूप में कागज पर उतर आते हैं। 

वरिष्ठ साहित्यकार, रंगकर्मी व रवांई घाटी के गौरव महाबीर रवांल्टा जी ने कहा कि यह हर्ष का विषय है कि नई पीढ़ी अपने साहित्य व संस्कृति में रुचि ले रही है और हमें उन्हें प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। उन्होंने इस संग्रह की सबसे लंबी कविता ‘तुझे लौटना होगा’ को पुस्तक की प्रतिनिधि कविता कहा और पलायन को आज के समय की सबसे बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि हम पलायन सिर्फ भौतिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी कर रहे हैं जोकि समाज के लिए किसी भी रूप में शुभ संकेत नहीं है और राघवेंद्र ने इसी चिंता को कविता के माध्यम से व्यक्त किया है। इस कविता की शैली पर बात करते हुए रवांल्टा जी ने कहा कि इसे पढ़कर हरिवंशराय बच्चन जी की ‘मधुशाला’ का स्मरण हो उठता है। 

वहीं वरिष्ठ साहित्यकार, कवि, रंगकर्मी, अभिनेता व चिट्ठी-पत्री पत्रिका के संपादक श्री मदन मोहन डुकलाण जी ने कहा कि  ‘तुझे लौटना होगा’ पलायन की पीड़ा का सजीव दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि कवि ने अपनी इस पुस्तक में गांव के शांत जीवन और शहर के आपाधापी भरे जीवन का तुलनात्मक रूप से सुंदर वर्णन किया है। उन्होंने कहा कि राघवेंद्र उनियाल एक संभावनाशील कवि हैं और हमें भविष्य में उनसे बेहतरीन सृजन की उम्मीदें हैं।




इस अवसर पर काव्य संध्या का भी आयोजन किया गया जिसमें अतिथि कवियों के साथ-साथ स्थानीय रचनाकारों ने भी अपनी रचनाओं से समा बॉंध दिया। देहरादून से आमंत्रित कवि धर्मेंद्र नेगी जी ने इस वर्ष आपदाओं से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए अपनी गढ़वाल़ी कविता ‘बादळ फटणा छन’ सुनाई। दूसरी रचना में उन्होंने अपने पहाड़ की परंपराओं से विमुख होते हुए समाज पर व्यंग्य करते हुए ‘ हक- हकूक बांठु छोड़ी ऐगेनी, घ्वीड़ अपणु चांठु छोड़ी ऐ गेनी’ सुनाकर कर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।  

कविता पाठ के क्रम में पहाड़ में आई आपदाओं का जिक्र करते हुए कवि आशीष सुंदरियाल ने पलायन के कारणों एवं पहाड़ की सच्चाई को बयां करते हुये अपनी रचना- पहाड़ मा रैणू जिंदगी मौत को खेल, कबि आपदा कबि गाडी लमडणी भेळ ‘ सुनाई। उनकी दूसरी रचना पहाड़ की जड़ो से जुडाव पर आधारित थी। गढ़वाल़ी के सुप्रसिद्ध गीतकार व कवि गिरीश सुंदरियाल जी ने अपने गीत ‘आला उज्याळा दिन’ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद मदन मोहन डुकलाण जी ने गढ़वाल़ी कविता ‘बरसु बाद’ और हिंदी कविता ‘चेहरे के घेरे का वाचन किया। फिर महाबीर रवांल्टा जी ने अजन्मा कवि’ शीर्षक की उत्कृष्ट रचना का पाठ किया। 

आमंत्रित कवियों के साथ साथ स्थानीय कवियों ने भी अपनी रचनाओं को प्रस्तुत किया जिसमें मातृशक्ति की विशेष सहभागिता रही। 

कार्यक्रम में प्रारंभ से अंत तक बने रहे माननीय विधायक गंगोत्री सुरेश चौहान जी ने  सभी कवियों की रचनाओं की सराहना करते हुए अपील की, कि रचनाओं को समाज में सकारात्मक उर्जा का संचार करने में विशेष भूमिका निभानी होगी तभी समाज आगे बढ़ सकेगा। 

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जिला पंचायत अध्यक्ष श्री रमेश चौहान जी ने कहा कि पलायन रोकने के लिए हमें ही स्वयं प्रयास करने होंगे। उन्होंने कहा कि हमें कोई भी कार्य करते हुये यह अवश्य सोचना चाहिए कि इससे समाज का क्या हित होगा। तभी उस कार्य की सार्थकता है। 

इस अवसर पर मंहत अजय पुरी जी, नौटियाल जी, पत्रकार मदनमोहन बिजल्वाण जी, प्रताप बिष्ट जी, डॉ राजेश जोशी जी, जाने माने चित्रकार मुकुल बडोनी जी एवं संसद में अपने जोरदार व्याख्यान के लिए चर्चित बालिका स्वाति नौटियाल सहित अनेकों साहित्य एवं कला प्रेमी, गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।  कार्यक्रम का संचालन अध्यापिका एवं कुशल संचालिका डॉ साधना जोशी जी ने किया।






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