हिंदी दिवस पर खास : हिन्दी एक ‘राष्ट्रभाषा’ बने, जिसके लिए 

प्रयास बहुत ज़रूरी (डॉ. हेमा उनियाल)

दिव्य पहाड़ पोर्टल की ओर आप सभी पाठकों को हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई।


हिंदी को ‘राजभाषा’ का दर्जा  १४ सितंबर  सन १९४९ को मिला था लेकिन  राष्ट्रभाषा को लेकर अनेकों बार लंबी वार्ताएं चलीं पर नतीजा कुछ नहीं निकल पाया। हिन्दी को यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलानी है तो सर्वप्रथम इसे ‘राजभाषा’ से ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने के लिए हर स्तर पर प्रयास करने होंगे। हिन्दी के लगभग एक हजार वर्ष पुराने इतिहास में अपने विकास के कई उतार-चढ़ावों को देखती आई हिन्दी,  संस्कृत से निकली भाषा है और विश्व में चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में जानी जाती है तब इसे ‘राष्ट्रभाषा’ बनाने में भारत के किसी भी राज्य के लोगों व उनकी सरकार को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भारत सरकार को  इस पर आवश्यक कदम उठाने चाहिए।

जिस भाषा को अधिकांश लोग बोल सकें,लिख सकें,विभिन्न माध्यमों से अभिव्यक्ति कर सकें और अपनी सांस्कृतिक गतिविधियों के बहुप्रयोग में ला सकें वह विकास की दृष्टि से एक सक्षम और समर्थ भाषा है । वैश्विक मंच पर भी हिन्दी अपनी पकड़ बना रही है। बाकी अपनी प्रांतीय,क्षेत्रीय भाषाएं भी जानना ज़रूरी है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं उन्हें हर स्तर पर सिखाने के प्रयास किए जा सकते हैं या उनका संरक्षण विभिन्न रूपों से किया जा सकता है।

देश,काल,परिस्थिति ,प्रयोग,उद्देश्य के आधार पर ही कोई भी भाषा जन्म लेती है, फलती- फूलती है और फिर अवसान की ओर चली  जाती है इसके लिए इतिहास गवाह है। आज जिस हिंदी के विकास को हम देखते हैं उसे एक बड़े परिवर्तन के द्वारा इस प्रकार समझा जा सकता है…




वैदिक संस्कृत> लौकिक संस्कृत> पालि> प्राकृत> अपभ्रंश> हिन्दी एवं अन्य भाषाएं

हिन्दी संस्कृत से उत्पन्न एक भाषा है । वैदिक संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम भाषा माना गया है। वेदों की रचना इसी भाषा में हुई किंतु इसका व्याकरण सुनिश्चित नहीं था जिसे महर्षि पाणिनि द्वारा  ‘अष्टाध्यायी’ नामक ग्रंथ लिखकर संस्कृत के व्याकरण को सुनिश्चित किया गया।आगे ‘वैदिक संस्कृत’ ही परिवर्तित होकर ‘लौकिक संस्कृत’ कहलाई जिसे हम आज ‘संस्कृत भाषा’ के नाम से जानते हैं वह वैदिक नहीं वरन उसका परिष्कृत रूप ‘लौकिक संस्कृत’ है। आगे लंबे समय तक पाणिनी के क्लिष्ट नियमों का पालन नहीं हो पाया और यह भाषा ‘पालि’ के रूप में समाज में समादृत हुई। इसी काल में भारत में जैन व बौद्ध धर्म का आगमन हुआ इसी ‘पालि’ भाषा में उनके धर्मग्रंथ रचे गए। समय के साथ ‘पालि’ भी स्थिर नहीं रह पाई और इसका अगला स्वरूप ‘प्राकृत’ भाषा के रूप में सामने आया।आगे इसके स्वरूप में भी परिवर्तन हुए और भाषा का अन्य स्वरूप ‘अपभ्रंश’ नाम से जाना गया। ‘अपभ्रंश’ का स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग हेतु  भिन्न  था जिन्हें मागधी, अर्द्ध मागधी, शौरसेनी आदि नामों से जाना गया। ‘शौरसेनी’ अपभ्रंश से ‘ब्रजभाषा’ (हिंदी) का विकास हुआ जो एक समय साहित्य की प्रमुख भाषा थी। आगे ब्रजभाषा का स्थान ‘खड़ी बोली’ हिंदी ने लिया।यह ‘खड़ी बोली’ हिंदी ही आज ‘हिंदी’ का मानक स्वरूप है।

हिंदी भाषा के विस्तार को तीन भागों में बांटा जा सकता है..




आदिकाल (आरंभ से १५००ई तक)

मध्यकाल (१५००से १८००ई तक)

आधुनिक काल (१८००ई से आज तक)

आधुनिक काल में आकर हिंदी भाषा का पूर्ण विकास हुआ है।

हिन्दी की जड़ें अब मज़बूत हो चुकी है अतः इसकी विलुप्ति या परिवर्तन का खतरा अब नजर नहीं आता। अलग- अलग क्षेत्र के लोगों ने इसके विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका जो निभाई है। जहां पर आज हम खड़े हैं ,बहुत संजीदा होकर यदि कहा जाए तो हिन्दी के साथ ही संस्कृत, अंग्रेजी, अपनी प्रांतीय बोली- भाषाओं का ज्ञान भी आवश्यक हो गया है। किसी भी  गांव या शहर  में आप उसकी बोली-भाषा के आधार पर सर्वप्रथम जुड़ पाते हैं। इसलिए जितनी भाषाओं का ज्ञान व्यक्ति कर ले, बहुत अच्छा  है।

अब समय आ गया है कि हिन्दी भाषा  में हर किसी को महारत हासिल कर  लेनी चाहिए, क्योंकि सभी कुछ तो ‘हिंदीमय’ है। जहां नहीं भी है उन्हें भी हिन्दी से जोड़ने की प्रमुख आवश्यकता है। हालांकि यह आसान तो नहीं है किन्तु हिन्दी को ‘राष्ट्रभाषा’ बनाना है तो वह सब कुछ करना होगा जो एक भाषा के स्थायित्व, विकास, प्रगति के लिए अति आवश्यक होता है।

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