नितिन त्रिपाठी

इस व्यक्ति को देखिए—लाल कृष्ण आडवाणी। अगर भारतीय राजनीति में दृढ़ता, आत्मविश्वास, निडरता और दूरदृष्टि किसी एक चेहरे में समाई हो, तो वह यही चेहरा है। यह कोई अचानक बना हुआ नेता नहीं थे, यह वह इंसान थे जिसने समय से पहले सोचना सीखा और अकेले खड़े रहना स्वीकार किया। वह एक संपन्न परिवार से आते थे। देश के विभाजन के समय जब पाकिस्तान छोड़ा, तो भारत वे हवाई जहाज़ से आए थे। इतने अमीर थे तब भी।

अगर उस समय कोई और उनकी जगह होता, तो सीधे कांग्रेस का दामन पकड़ता, सत्ता के आसपास रहता और जीवन भर सुरक्षित और समृद्ध रहता। लेकिन आडवाणी ने वह रास्ता नहीं चुना। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बनना चुना—बिना सत्ता, बिना सुरक्षा, बिना चमक। वे उस पीढ़ी के शायद गिने-चुने नेताओं में से हैं जिन्होंने कांग्रेस की सदस्यता कभी नहीं ली। जब भारतीय जनसंघ अस्तित्व में आया, तो वे उसके पदाधिकारी बने और फिर वही यात्रा—चरैवेति चरैवेति—लगातार, बिना थके, बिना शिकायत।

भारतीय राजनीति में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्होंने आज़ादी के आसपास किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाया हो और पूरी ज़िंदगी उसी के साथ खड़े रहे हों। आडवाणी ने पार्टी को सिर्फ़ भाषणों से नहीं, अपने दिमाग़, अपनी दृष्टि और अपने पैसों से भी सींचा। उस समय यह सोचना कि एक नई और कमज़ोर पार्टी एक दिन भारत पर शासन करेगी, साहस मांगता था। यह आज के बीजेपी कार्यकर्ताओं को आसान लगता है, लेकिन उस दौर में कांग्रेस से आगे कुछ सोच पाना ही विद्रोह था। आडवाणी ने उसी समय “कांग्रेस मुक्त भारत” की कल्पना कर ली थी।

मुद्दे चुनने में उनकी दूरदृष्टि अलग ही स्तर की थी। राम मंदिर हो, काला धन हो या फिर तकनीक और इंटरनेट—वे हमेशा समय से बहुत पहले खड़े दिखाई देते थे। जब राजनीति में कंप्यूटर भी अजनबी शब्द था, तब वे ब्लॉग लिख रहे थे। वे जानते थे कि आने वाली लड़ाइयाँ सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, विचारों और तकनीक के मैदान में लड़ी जाएँगी।

सिद्धांतों की बात करें, तो आज की राजनीति में आडवाणी लगभग अविश्वसनीय लगते हैं। जब वे सत्ता के शिखर पर थे और उनका नाम का एक्रोनाइम एक डायरी में आया, तो उन्होंने पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने कहा कि जब तक नाम साफ़ नहीं होगा, वे वापस नहीं लौटेंगे। ज़रा आज के नेताओं की कल्पना कीजिए, जो रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी बेहयाई से कह देते हैं—यह विपक्ष की साज़िश है। आडवाणी परिवारवाद के कट्टर विरोधी थे, इसलिए राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी उन्होंने अपनी बेटी को कभी चुनाव नहीं लड़ने दिया।

विडंबना यह रही कि जवानी में उनसे कहा गया कि वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी के लिए रास्ता छोड़िए, और उम्र के उस पड़ाव पर जब वे स्वयं सबसे वरिष्ठ थे, उनसे कहा गया कि अब युवा नेतृत्व के लिए जगह बनाइए। उन्होंने दोनों बार सिर झुकाया, मन में गांठ बाँधकर नहीं, सार्वजनिक मर्यादा के साथ।

नई पीढ़ी के कुछ समर्थकों ने उन पर नीचे स्तर के हमले किए, मीम बनाए, ताने कसे, लेकिन आडवाणी ने कभी अपनी पीड़ा को मर्यादा से बाहर नहीं जाने दिया। उन्होंने परंपराएँ निभाईं, सीमाएँ नहीं लांघीं। अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार में, अस्सी की उम्र पार कर चुके आडवाणी को मैंने देखा—कमज़ोर शरीर, लेकिन वही गरिमा, वही कर्तव्यबोध।

जब भी भारतीय जनता पार्टी का इतिहास लिखा जाएगा, लाल कृष्ण आडवाणी को उस प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा जो कभी प्रधानमंत्री नहीं बना। आज वे एक शांत, सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं। कभी-कभी उनकी ही पार्टी के समर्थक उन्हें मीम में बदल देते हैं, लेकिन शायद आडवाणी को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उन्होंने एक सपना देखा था, एक दिशा चुनी थी, और आज वह सपना पूरा हो चुका है—पंचायत से लेकर राष्ट्रपति भवन तक उनकी पार्टी सत्ता में है।

कुछ लोग सत्ता चाहते हैं, कुछ लोग सम्मान—आडवाणी ने इतिहास चुना। #longpost #people100

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