लोक गायिका हेमा नेगी करासी "उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार" से होगीं सम्मानितलोक गायिका हेमा नेगी करासी "उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार" से होगीं सम्मानित

उत्तराखंड : सुप्रसिद्ध लोक गायिका हेमा नेगी करासी “उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार” से होगीं सम्मानित

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रुद्रप्रयाग : लोक जागर, मांगल गीतों और पारम्परिक वेश भूषा के माध्यम से उत्तराखंड की लोक संस्कृति को जीवंत करने में लगी प्रसिद्ध लोक गायिका हेमा नेगी करासी का चयन देश के प्रतिष्ठ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए हुआ है। यह सम्मान भारत के राष्ट्रिय संगीत, नृत्य एवं नाट्य अकादमी द्वारा प्रदान किया जाएगा। यह सम्मान न केवल उनकी वर्षों की साधना, मेहनत और लोक संस्कृति के प्रति समर्पण का परिणाम है बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोक कला एवं लोक संगीत के लिए भी गौरव का क्षण है।

हेमा नेगी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोकगीतों एवं पारम्परिक वेशभूषा के सरंक्षण एवं संवर्धन में अपना अतुल्य योगदान दे रही है। यकीनन उन्होंने जागर और लोक गीतों के माध्यम से लोक सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रिय स्तर पर पहचान दिलाई है।

बचपन से ही थी लोक जागर और गीतों में रूचि

अगस्त्यमुनि ब्लाक के दशज्यूला-कांडई पट्टी के टुखिंड़ा गांव निवासी चंद्र सिंह नेगी की छह संतानों में चौथी हेमा को बचपन से मांगल, जागर और पर्यावरण से जुड़े गीतों के प्रति रुचि थी। वर्ष 2003 में जीआईसी कांडई के वार्षिकोत्सव में हेमा ने ‘धरती हमरा गढ़वाल की’ गीत गाया तो समारोह में मौजूद आकाशवाणी व दूरदर्शन से आए सदस्यों ने भी उनकी सराहना की,और यही से हेमा को लोक गायन की यात्रा की शुरूआत हुई। संगीत शिक्षक गिरीश शर्मा के दिशा-निर्देशन में उन्होंने संगीत के गुर सीखें और गायन के क्षेत्र में उपलब्धियों को छूने लगी।

क्या बुन तब कैसेट से मिली पहचान

बतौर लोक गायिका वर्ष 2005 में हेमा नेगी की पहली ऑडियो गढ़वाली एलबम ‘क्या बुन तब’ और लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ ‘कथा कार्तिक स्वामी’ एलबम रिलीज हुई, जिन्हें लोगों ने खूब सराहा। लेकिन विवाह के उपरांत 2008 से 2011 तक कुछ वर्षों के लिए वो गायकी से दूर रही पर 2012 में माई मठियाणा देवी और 2013 में गिर गेंदआ से उन्होंने फिर वापसी की। इसी के साथ हेमा का गायन का सफर निरंतर जारी रहा,जो आज तक जारी हैं। उनकी गायन कला को देश-विदेश में कई सम्मानों से नवाज़ा जा चुका हैं।