एक राष्ट्र-एक चुनाव: संत समागम में ऐतिहासिक संकल्प, शिवराज और धामी के 3 बड़े बयान
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!1. संत समागम का मुख्य उद्देश्य, 2. एक राष्ट्र-एक चुनाव के फायदे
हरिद्वार : देश में एक राष्ट्र-एक चुनाव (One Nation, One Election) को लेकर बहस और तैयारियां तेज हो गई हैं। इसी सिलसिले में आयोजित एक विशाल संत समागम में ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ का संकल्प गूंजा। इस कार्यक्रम में पहुंचे केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देश के प्रतिष्ठित संतों से मुलाकात की और इस ऐतिहासिक सुधार के लिए उनका समर्थन और आशीर्वाद मांगा
बार-बार के चुनाव प्रगति में बाधक: शिवराज सिंह चौहान
केंद्रीय मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के इस संकल्प का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि देश में निरंतर होने वाले चुनाव विकास की रफ्तार को धीमा कर देते हैं। जब भी चुनाव होते हैं, प्रशासनिक मशीनरी तैयारियों में व्यस्त हो जाती है और आचार संहिता के कारण स्कूल-कॉलेजों की पढ़ाई से लेकर बुनियादी विकास कार्य तक प्रभावित होते हैं। यदि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं, तो देश के कीमती संसाधनों और समय दोनों की भारी बचत होगी। इससे प्रशासनिक तंत्र का पूरा ध्यान केवल सुशासन और जनकल्याण पर केंद्रित रहेगा।
केंद्रीय मंत्री ने इस मंच से राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के पूरे स्वरूप को अपनाने का भी पुरजोर आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वंदे मातरम किसी दल या समुदाय का नहीं, बल्कि हमारी देशभक्ति और राष्ट्रीय अखंडता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने संतों से अपील की कि जब इस पावन भूमि से संतों की आवाज गूंजेगी और जन-जन में चेतना जगेगी, तो किसी में भी वंदे मातरम के पूर्ण गान का विरोध करने का साहस नहीं बचेगा।
यह राजनीतिक नहीं, बल्कि सुशासन का राष्ट्रीय विषय : मुख्यमंत्री धामी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्रीय मंत्री के विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह सीधे तौर पर राष्ट्रहित, सुशासन और देश के संसाधनों के सही उपयोग से जुड़ा विषय है। भारत भले ही दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो और चुनाव यहाँ एक पर्व की तरह हैं, लेकिन साल भर चलने वाली चुनावी प्रक्रिया शासन व्यवस्था को प्रभावित करती है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक राष्ट्र-एक चुनाव विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाकर एक युगांतकारी पहल की है। ‘विकसित भारत-2047’ के महान संकल्प को सिद्ध करने के लिए देश में विकास की निरंतरता बेहद जरूरी है। आज जब भारत वैश्विक मंच पर सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है, तब सरकार का अधिकतम समय रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में लगना चाहिए।
उन्होंने सनातन परंपरा का स्मरण कराते हुए कहा कि संतों ने हमेशा राष्ट्र को सही दिशा दिखाई है, इसलिए लोकतंत्र को मजबूत करने, संस्कृति को सुरक्षित रखने और राष्ट्र को सर्वोपरि बनाने के इस महाअभियान में संत समाज आगे आकर देश का मार्गदर्शन करे।
एक राष्ट्र-एक चुनाव देश के विकास के लिए क्यों जरूरी है?
संत समागम में मौजूद विचारकों और राजनेताओं ने इस बात पर विस्तृत चर्चा की कि आखिर भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह नीति क्यों आवश्यक है। इसके मुख्य फायदों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
- सरकारी धन की भारी बचत: हर साल देश के किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव या स्थानीय निकाय चुनाव होते रहते हैं। इन चुनावों को कराने में देश के राजस्व का अरबों-खरबों रुपया खर्च होता है। यदि पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते हैं, तो इस भारी-भरकम खर्च को रोककर उस पैसे का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जा सकेगा।
- प्रशासनिक दक्षता में सुधार: बार-बार होने वाले चुनावों के कारण देश के सुरक्षा बलों, शिक्षकों और अन्य सरकारी कर्मचारियों को लगातार चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है। इससे प्रशासनिक और शैक्षणिक कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं। एक साथ चुनाव होने से प्रशासनिक अमले का समय बचेगा और वे कानून व्यवस्था व जनसेवा पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
- नीतिगत स्थिरता और निरंतरता: राजनीतिक दल हमेशा चुनावी मोड में रहने के कारण कई बार दीर्घकालिक और कड़े फैसले लेने से कतराते हैं। एक राष्ट्र-एक चुनाव लागू होने से केंद्र और राज्यों की सरकारों को बिना किसी चुनावी दबाव के 5 साल तक देश और प्रदेश के विकास के लिए योजनाएं बनाने और उन्हें धरातल पर उतारने का पूरा अवसर मिलेगा।
संत समाज ने किया विचार का स्वागत
नेताओं की बात को सुनने के बाद समागम में उपस्थित शीर्ष संतों और पूज्य आचार्यों ने भी इस राष्ट्रीय संकल्प की सराहना की। संतों ने कहा कि जो कदम देश के पैसे को बचाता हो, समय को बचाता हो और समाज को बार-बार की राजनीतिक कड़वाहट से दूर रखता हो, वह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। इस पावन समागम के बाद राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक गलियारों में एक राष्ट्र-एक चुनाव को लेकर विमर्श और तेज हो गया है। आने वाले दिनों में इस मुहिम को देशव्यापी जन-आंदोलन बनाने की तैयारी है।

