पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 : इन दिनों सीमांत जनपद में पूरी भव्यता, पारंपरिक आस्था और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। उत्तराखंड के इस अंचल में प्रकृति, आस्था और लोकसंस्कृति के अटूट बंधन का प्रतीक यह महालोकपर्व सोर घाटी से लेकर उच्च हिमालयी अंचल तक संपूर्ण वातावरण को देवमय बना चुका है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि यानी बिरुड़ पंचमी से आरंभ होकर अष्टमी तक चलने वाले इस सात दिवसीय अनुष्ठान के दौरान पिथौरागढ़ के ऐतिहासिक रामलीला मैदानों, बाजारों और दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में ढोल-दमाऊ की थाप, हुड़की की गूंज और महिलाओं के पारंपरिक नृत्यों की स्वरलहरियां गूंज रही हैं। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 इस बार न केवल धार्मिक अनुष्ठान का केंद्र है, बल्कि यह हमारी प्राचीन लोकगाथाओं और सामूहिक जीवनशैली का सबसे जीवंत दस्तावेज भी साबित हो रहा है।
पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम
कुमाऊं की पहाड़ियों में जब भाद्रपद का महीना आता है, तो यहाँ की आबोहवा में एक अलग ही सांस्कृतिक ऊर्जा घुल जाती है। सोर घाटी के धान के हरे-भरे खेत और कलकल बहते प्राकृतिक जलस्रोत इस उत्सव के रंग को और भी प्रगाढ़ कर देते हैं। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। इस वर्ष पिथौरागढ़ के नगर क्षेत्रों से लेकर सीमांत गांवों जैसे खड़कोट, सिमल्टी, और विरपई तक लोगों में ऐसा उत्साह देखने को मिल रहा है जो आधुनिकता की दौड़ के बीच भी अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। सुबह की पहली किरण के साथ ही महिलाओं की टोलियां पारंपरिक परिधानों में सजी-धजी नजर आती हैं और इस महापर्व के लोकगीतों की गूंज से पूरा इलाका प्रफुल्लित हो उठता है।
पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व में शिव-पार्वती (गौरा-महेश्वर) का मायका
इस पारंपरिक उत्सव की सबसे अनूठी, सुंदर और भावुक कर देने वाली विशेषता यह है कि इसमें पहाड़ी समाज भगवान शिव को अपने परिवार के ‘जीजाजी’ और माता पार्वती यानी ‘गौरा’ को अपनी ‘दीदी’ के रूप में देखता है। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 की लोक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास में मां गौरा अपने मायके यानी कुमाऊं की आंचल में आती हैं और उन्हें लेने के लिए स्वयं भगवान शिव कैलाश से साक्षात पृथ्वी पर पधारते हैं। मायके आई अपनी दीदी और जीजाजी के आदर-सत्कार, मिलन और फिर उनकी विदाई की यह पूरी कथा लोकगाथाओं और गीतों के माध्यम से जन-जन के मन में रची-बसी है। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 के दौरान विभिन्न गांवों से लाई जाने वाली गौरा-महेश्वर की मूर्तियों और भव्य देव डोलियों की स्थापना इस महोत्सव का मुख्य प्राण होती है। इन डोलियों के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा से नम हो जाती हैं।
बिरुड़ पंचमी से पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 की शुरुआत
इस महान पर्व का विधिवत आरंभ ‘बिरुड़ पंचमी’ के दिन तांबे या कांसे के पात्रों में पांच या सात प्रकार के अनाजों को भिगोने की परंपरा के साथ होता है। इन अनाजों में गेहूं, गहत, गूंज, मास, मटर और स्थानीय स्तर पर उत्पादित अन्य धान्य शामिल होते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘बिरुड़’ या ‘बिरुडा’ कहा जाता है। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 के नियमों के अनुसार, पंचमी के दिन इन बीजों को पूरी पवित्रता के साथ जल में भिगोया जाता है। इसके पश्चात सप्तमी के दिन महिलाएं प्रातःकाल पारंपरिक आभूषणों और वेशभूषा में सुसज्जित होकर इन पात्रों को समीपवर्ती नौलों, धारों या प्राकृतिक जलसरोतों पर ले जाती हैं और पवित्र जल से इनका विधिवत शोधन व पूजन करती हैं। इसके बाद खेतों से धान के पौधे लाए जाते हैं और उन्हें कलात्मक रूप से गौरा-महेश्वर के स्वरूप में सजाकर घर-आंगन या सामूहिक पंडालों में स्थापित किया जाता है। यह कृषि संस्कृति से जुड़ाव का एक ऐसा अनूठा रूप है, जो हमारी अन्नदाता परंपरा को सहेजता है।
पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व में झोड़ा, चांचरी और पारंपरिक लोकनृत्यों की धूम
पिथौरागढ़ के मुख्य चौराहों और मैदानों में इन दिनों प्रतिदिन शाम को लगने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि यहाँ के लोग अपनी कला के प्रति कितने समर्पित हैं। मैदान के बीचों-बीच महिलाओं और पुरुषों द्वारा बनाए जाने वाले गोल घेरे और परंपरागत आठूं के खेल मेले के उल्लास को कई गुना बढ़ा देते हैं। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 के इस विशेष अवसर पर ‘सिलगड़ी का पाला चाला’ और ‘सोला सोल्यानी’ जैसे पारंपरिक कुमाऊँनी गीतों पर जब लोग कदम से कदम मिलाकर झोड़ा और चांचरी प्रस्तुत करते हैं, तो पूरा परिसर तालियों की गूंज से गूंज उठता है। इन नृत्यों में किसी प्रकार के कृत्रिम संगीत का प्रयोग नहीं होता, बल्कि कलाकारों के गले से निकले स्वर और पैरों की थाप ही इस संगीत का आधार बनती है, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है।
पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 से पर्यावरण और जल स्रोतों का संरक्षण
सातूं-आठूं का यह पर्व हमें पर्यावरण और जल संरक्षण का भी गहरा संदेश देता है। सदियों पुरानी यह परंपरा इस बात पर जोर देती है कि हमारे प्राकृतिक जलस्रोत—नौले, धारे और पखेरे—कितने पवित्र हैं। सप्तमी और अष्टमी के दौरान इन जलसरोतों की विशेष साफ-सफाई की जाती है और उनका पूजन किया जाता है। आधुनिक समय में जब जल संकट एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, तब पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 जैसे आयोजन हमें यह सिखाते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जल और पर्यावरण को बचाने के लिए संस्कृति को ही उसका रक्षक बना दिया था। इसके साथ ही इस पर्व में पूरा पहाड़ी समाज एक साथ मिलकर काम करता है।
महिला सहभागिता और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत का संदेश
इस संपूर्ण अनुष्ठान की धुरी हमारी माताएं और बहनें हैं। घर की चारदीवारी से लेकर सार्वजनिक आयोजनों तक, गौरा-महेश्वर की पूजा-अर्चना से लेकर लोकगीतों के गायन तक—हर जगह महिलाओं की सक्रिय सहभागिता यह बताती है कि कुमाऊं की संस्कृति को जीवित रखने में नारी शक्ति का योगदान सर्वोपरि है। पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 के मेलों और अनुष्ठानों में भाग ले रही युवा पीढ़ी और स्कूली बालिकाओं को देखकर यह विश्वास और मजबूत होता है कि हमारी यह प्राचीन विरासत सुरक्षित हाथों में है। बच्चे पारंपरिक परिधानों में सज-धज कर इन लोकनृत्यों को सीखते हैं और अपनी जड़ों से जुड़ते हैं।
निष्कर्ष: पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व हमारी प्राचीन धरोहर का जीवंत हस्ताक्षर
संक्षेप में कहें तो पिथौरागढ़ सातूं आठूं पर्व 2026 केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह समाज के हर वर्ग को आपसी भाईचारे और प्रेम के धागे में पिरोने वाला एक सामाजिक महाकुंभ है। भगवान शिव और मां गौरा के बहाने पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट को महसूस करना और अपनी कृषि व जल संस्कृति को सहेजना इस पर्व की असल आत्मा है। पिथौरागढ़ में इस वर्ष जिस प्रकार जनसहयोग, पारंपरिक ऊर्जा और स्वदेशी उल्लास के साथ यह उत्सव संपन्न हो रहा है, वह यह साबित करता है कि हिमालयी संस्कृति की ये अमूल्य धाराएं समय के साथ और अधिक प्रखर व ऊर्जावान होती जा रही हैं।

