आइए अपने गांवों को सजाएं उन्हें स्वच्छ और साफ रखने में अपनी 

जिम्मेदारी निभाएं

                      चंद्र सिंह रावत “स्वतंत्र”

                             (इंदिरापुरम, गाजियाबाद)

(आइए, हम सब गांव को सजाएं, सुंदर बनाएं, सुदृढ़ बनाएं, ग्राम एकता और अखंडता को बरकरार रखें, एक नए भारत के निर्माण में योगदान करें, मेरी/हमारी जिम्मेदारी को समझें, सच्चे भारतीय के कर्तव्य का निर्वहन करें, भारत गांवों का देश है इसे साकार करें, स्वीकार करें, अपने धरोहर की रक्षा करें, अपने माटी को प्यार करें। यदि आपने ऐसा कर दिया तब मेरा यह लेखन औऱ चिंतन सार्थक होगा, बस आपसे और कुछ नहीं चाहिए, मुझे मेरा अपना प्यारा सा गांव उसी रूप में लौटा दें जिस रूप में उसे छोड़ा था आखिर ये गांव और घर हमारी पहचान हैं हमारी थाती हैं इसका संरक्षण कर नवजीवन प्रदान करें। हां, हम कर सकते हैं। हां, हम ऐसा करेंगे। हां, हमें ऐसा करना चाहिए)

एक ज्वलंत और बेहद महत्वपूर्ण विषय से आपको परिचय करा रहा हूं। वह है हमारे गांवों की साफ सफाई।

जो लोग गांवों में रह रहे हैं उनके घर और घरों के आसपास  साफ सफाई खूब रहती है और रहनी भी चाहिए क्योंकि वे लोग गांव में हैं। साफ सफाई नियमित क्रिया के अंतर्गत भी आती है। उनके मकान देख लें तो उसकी लिपाई पुताई देर सवेर होती रहती है। उनके घरों के आसपास की घास की छंटाई भी होती रहती है क्योंकि उस स्थान पर निवास करते हैं और  यह सभ्य समाज के लिए आवश्यक भी है।

अब बात करते हैं उन लोगों की, जिन्होंने अपने घर/मकान/गांव वर्षों पहले छोड़ दिए हैं और वे न तो अपने घरों की सफाई करते हैं न ही घर के आसपास  के झाड़ झंखाड़ को कटवाते हैं, न ही अपने मकानों की सुध लेते हैं। गौशालाएं तो लगभग सभी की टूट गई हैं। उसको चिंहित करने की जरूरत नहीं है। गौशाला टूट भी जाय तो चिंता की बात नहीं किंतु रिहायसी मकान भी टूटने के कगार पर हैं जो कि घोर चिंता का विषय हैं। हमारी पहचान ही देवभूमि उत्तराखंड और गांव हैं। पचास/पिचहत्तर/सौ/डेढ़ सौ सालों से लोग बाहर हैं किंतु अपने को मूल निवासी उत्तराखंड का ही बताते हैं।

निदान क्या हो

हम, जो लोग गांव में नहीं रहते और जिनके घर/कुड़ी (मकान) बंजर हो गए हैं उन्हें चाहिए कि अपने घरों की मरम्मत करवाएं, उनकी देखभाल करें। साफ सफाई करवाएं। गांव में किसी को भी यह काम करने के लिए कहें। थोड़ी सी रकम आपके जेब से खर्च होगी किंतु आपका मकान साफ सुथरा रहेगा। जो लोग गांव में रह रहे हैं उनको भी देखने सुनने में अच्छा लगेगा। उनके घर के पास का मकान भी साफ रहे तो सभी गांववासियों को देखने में अच्छा लगेगा। जो दूसरे गांव के लोग हमारे गांव में आएंगे तो वह भी तारीफ किए बगैर न रह सकेंगे। यह एक अच्छी मिसाल भी कायम होगी। आप मरम्मत करने हेतु एकमुश्त खर्च कर सकते हैं। मकान की रंगाई पुताई हर छः माह में की जा सकती है। घर के आसपास के झाड़ झंखाड़ को हर तीन माह में हटाया जा सकता है इसके लिए थोड़ा सा द्रव्य खर्च करना होगा, जो आप बखूबी कर सकते हैं। थोड़ी सी हिम्मत आपको दिखानी होगी और गांव में न रहते हुए भी आपका घर/मकान साफ और सुदृढ रहेगा। 

यह कार्य कैसे होगा

गांवों में बहुत से लोग हैं जो यह सब जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं बस आपको उन्हें सिर्फ अपना काम बतलाना है। वे करने को तैयार हैं। इस प्रकार से हम गांव के लोगों से और अपने गांव घरों से भी जुड़े रहेंगे। गांव साफ सुथरे रहेंगे तो आपको भी और जो लोग गांवों में हैं उन्हें भी अच्छा लगेगा। हमारे घरों के चारों तरफ जो झाड़ियां उग आई हैं निरंतर रूप से साफ होती रहेंगी तो गांव के लोग जंगली जानवरों के आतंक से भी भयमुक्त रहेंगे। जो लोग आज गांवों में नहीं हैं उनके घरों के आसपास जंगली घास से जंगल बन गया है जिससे पूरा गांव जंगली घास की जद में आ गया है। मार्च के बाद वह घास जब सूखने लगती है और गलती से भी एक आग की एक चिंगारी उस सूखी घास में पड़ जाय तब कई बार वह दावानल पूरे गांव को लीलने को तैयार रहता है। अब तो उस आग को शांत करने, बुझाने के लिए भी गांवों में लोग नहीं रहे, जिस कारण कभी भी पूरे के पूरे गांव आग के आगोश में आ सकते हैं।

करबद्ध प्रार्थना

आपसे विनम्र विनती है कि गांव के लोगों को सहयोग करें। अपने घर/मकानों की सुरक्षा करें। उन्हें सुदृढ़/सुरक्षित बनाएं। जब भी मन करे तब गांव जाएं, हो सके तो किसी को अपने घर की ताला/चाबी भी सौंप आएं। ताकि वह हर पंद्रह/बीस दिनों में मकानों के किवाड़ खोल कर अंदर की भी साफ सफाई कर सकें। घर के अंदर कुछ देर हवा/धूप भी जा सके। इस प्रकार से मकान का जीवन भी दीर्घ होगा। जो घर/मकान नियमित रूप से नहीं खुलते हैं या खोले नहीं जाते हैं शीघ्र टूटन के कगार पर आ जाते हैं। गांव के मध्य में टूटे मकान नुकसान पहुंचाते हैं और गांव की शोभा, गरिमा खराब होती है। टूटे/उजड़े/खंडित मकान भुतहा लगते हैं।


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