संसद में उठेगी गढ़वाली कुमाऊनी भाषा की संवैधानिक मांग सांसदों ने दिया भरोसा

नई दिल्ली: उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच दिल्ली पिछले कई वर्षों से अपनी गढ़वाली कुमाऊनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु जी तोड प्रयास कर रहा है। इसी सिलसिले मे मंच की अगुवाई में उत्तराखंड के कई साहित्यकारों ने  जुलाई 2022 को केंद्रीय रक्षा राज्य एवं पर्यटन राज्य मंत्री श्री अजय भट्ट, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखंड तीरथ सिंह रावत,  अल्मोड़ा से लोक सभा सांसद पूर्व केंद्रीय कपडा राज्य मंत्री श्री अजय टम्टा तथा भाजपा राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी व राज्य सभा सांसद श्री अनिल बलूनी से अलग अलग भेंट की। उन्होंंनेे सबसे मिलकर अपनी आवाज को संसद में रखने की मांग की इस पर सांसदों ने उन्हें पूरा भरोसा दिया है।

उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच के संरक्षक  डॉ. विनोद बछेती  ने कहा कि लगभग आठसो-नौसो साल पुरानी गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है। यहां तक कि राजशाही के समय भी इन भाषाओं के प्रचलन में होने के प्रमाण है। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार इन दोनों भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उचित सम्मान दे।

मंच के संयोजक दिनेश ध्यानी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधियों ने इस दिशा में सकारात्मक पहल करने का आश्वासन दिया और कहा कि वे इस दिशा में हर पहल करने को तैयार हैं।  

जनप्रतिंधियों से मिलने वाले प्रतिनिधि मंडल में बरिष्ठ साहित्यकार रमेश घिल्डियाल, जयपाल रावत, डॉ सतीश कालेश्वरी, जगमोहन सिंह रावत, दर्शन सिंह रावत, प्रतिबिम्ब बर्थवाल, रमेश हितैषी, अनिल पंत,  डॉ सतेंद्र सिंह समेत कई साहित्यकार/ भाषाविद शामिल थे। 

ज्ञातव्य हो कि सदियों पुरानी गढ़वाली-कुमाउनी भाषाएँ हर लिहाज से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने में सक्षम हैं।  साहित्य अकदामी ने चार-चार साहित्यकारों को सम्मान दिया है, हिंदी अकादमी समय-समय पर सहभाषा सम्मान इन भाषाओं के साहित्यकारों को देती है और राष्ट्रिय पुस्तक न्यास द्वारा भी गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में व अन्य भाषाई पुस्तकों का अनुवाद गढ़वाली और कुमाउनी भाषाओं में हो रहा है।  

साहित्यकारों के प्रतिनिधि मंडल का कहना था कि गढ़वाली कुमाऊनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं होने देने के लिए कुछ लोग रणनीति के तहत षडयंत्र कर रहे हैं । जनता और जनप्रतिनिधियों को इस बात को समझना चाहिए कि व्यक्ति या संस्था कोई भाषा कमरे में बैठकर नहीं बना सकती है। यह सतत् और सदियों की रवायत से बनती हैं। कुछ लोग अपनी दुकान चलाने के लिए एक तरफ गढ़वाली कुमाऊनी का विरोध करते हैं और जब फायदे की बात आती है तो गढ़वाली कुमाऊनी के साहित्यकार और तथाकथित भाषाविद बन जाते हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए और ऐसे चेहरों को पहचानने की जरूरत है। अगर कोई यह मानता है कि वे तथाकथित उत्तराखण्डी भाषा के साहित्यकार हैं तो फिर गढ़वाली कुमाऊनी में क्यों पुस्तकें छाप रहे हैं। क्यों समाज को गुमराह कर रहे हैं। यह प्रश्न विचारणीय है

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