बिच्छुघास




स्वरोजगार का साधन बनी बिच्छू घास : उत्तराखंड का हर व्यक्ति कंडाली, सिशूण बिच्छू घास से परिचित है। ये कंडाली पहाड़ के लोगों के लिए बेकार की एक झाड़ी मात्र है जबकि इसमें कई औषधीय गुण समाये हुए है। हालांकि पूर्व में पहाड़ के लोग इसकी सब्जी (धवड़ी) बनाकर जरूर खाते थे जो उन्हें सर्दियों के मौसम में सर्दी के प्रभाव से सुरक्षित रखता था लेकिन पहाड़ों से शहरों का रुख करने वाले लोगों के लिए ये कांटेदार पतियों वाला पौधा बच्चों को डराने व शरीर में झमझ्याट डालने की याद मात्र तक रह गया। किंतु अब कुछ लोगों द्वारा बिच्छू घास पर शोध करने के बाद लोग इसके महत्त्व को समझ रहे है यही कारण है कि अब लोग इसे स्वरोजगार के रूप में ले रहे हैं। सिशूण (कंडाली) से न केवल ग्रीन टी तैयार की जा रही है बल्कि इससे कई तरह के खाद्य प्रोडक्ट व कपडे तक बनाए जा रहे है।




उत्तराखंड के अल्मोड़ा  में बिच्छू घास कंडाली, सिशूण से कपडे तैयार किये जा रहे हैं। अल्मोड़ा से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित ताड़ीखेत में क्षेत्र की महिलाओं को बिच्छुघास से रेसे निकालने के साथ ही उससे कपडे बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ग्रामीण उद्यम वृद्धि वेग परियोजना के अंतर्गत इन महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। बिच्छू घास की टहनियों से रेशा प्राप्त कर धागा तैयार किया जाता है जिसका उपयोग कपडे बानाने में किया जाता है।  इस योजना के अंतर्गत ताड़ीखेत और भिक्यासैंण की सौ से अधिक महिलाओं ने प्रशिक्षण लिया है।

इसी के साथ अल्मोड़ा की ग्रीन हिल्स संस्था की सचिव डॉ. वसुधा पंत ने बिच्छुघास के औषधीय गुणों को पहचानकर उससे लगभग 25 उत्पाद तैयार किये हैं। उन्होंने  बताया पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रिय हिमालय अध्ययन मिशन के अंतर्गत यह कार्य किया जा रहा है।

बता दें कि डॉ. वसुधा पंत ने 2015 में बिच्छू घास पर शोध शुरू किया था। शोध पूर्ण होने पर उन्होंने जुलाई 2020 से  इससे फ़ूड प्रोडक्ट बनाने शुरू कर  दिए थे। उनके द्वारा इससे मिक्स आटा, मिक्स शूप, जीरा मिक्स जैसे लगभग 25 प्रोडक्ट बनाये जा चुके हैं। उत्तराखंड में पाया जाने वाला यह औषधीय पौधा स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को दूरस्थ रखने के साथ ही महिलाओं को रोजगार भी प्रदान कर रहा है।  






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