उत्तरकाशी न्यूज़ : दयारा बुग्याल में उमड़ा आस्था और उल्लास का सैलाब, 11 हजार फीट की ऊंचाई पर खेली गई दूध-मक्खन की ऐतिहासिक होली
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!अंढूड़ी उत्सव 2026 : उत्तरकाशी जिले में विश्व प्रसिद्ध दयारा बुग्याल में पारंपरिक अंढूड़ी उत्सव (Butter Festival) का शुभारंभ हो गया है। इस मौके पर दयारा बुग्याल पूरी तरह अनूठे रंग में रंगा नजर आया। भाद्रपद संक्रांति के पावन अवसर पर आयोजित इस उत्सव में रैथल समेत आस-पास के पंचगाई पट्टी के गांवों के हजारों ग्रामीणों, देश-विदेश से आए पर्यटकों और स्थानीय लोगों ने प्रतिभाग किया और पारंपरिक रूप से दूध, दही तथा मक्खन की होली खेली।
ग्रामीणों के आराध्य सोमेश्वर देवता की अगुवाई में शुरू हुआ उत्सव
इस उत्सव की शुरुआत पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई। रैथल गांव से स्थानीय ग्रामीण अपने आराध्य सोमेश्वर देवता की डोली को कंधों पर उठाकर एक विशाल शोभा यात्रा के साथ लगभग 8 किलोमीटर के दुर्गम पहाड़ी ट्रैक को पार कर दयारा बुग्याल पहुंचे । यहाँ पहुंचने पर उन्होंने देव डोलियों की विशेष पूजा-अर्चना करने के साथ ही प्रकृति और देवताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए सुख-समृद्धि तथा अपने पशुधन की सुरक्षा की मन्नत मांगी।
गुलाल के बजाय उड़ा मक्खन और मट्ठा
पूजा संपन्न होने के बाद 28 वर्ग किलोमीटर में फैले मखमली घास के मैदान (बुग्याल) में मक्खन की होली का दौर शुरू हुआ। इस उत्सव की खास बात यह रही कि लोगों ने रासायनिक रंगों या गुलाल के बजाय शुद्ध रूप से घर में तैयार दूध, मक्खन और छाछ से होली खेली। वहीं महाराष्ट्र की तर्ज पर इस हिमालयी क्षेत्र में दही-हांडी प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया, जो पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण रही। ढोल-दमाऊं और रणसिंघे जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज पर स्थानीय महिलाओं और पुरुषों ने पारंपरिक रासौ और तांदी नृत्य की शानदार प्रस्तुतियां देकर सभी को पहाड़ी संस्कृति में रंग दिया ।
क्या है इस सदियों पुरानी परंपरा का इतिहास?
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, ग्रीष्मकाल और मानसून के दौरान पहाड़ों के चरवाहे अपने मवेशियों (गाय-भैंसों) को चराने के लिए बुग्यालों में ले जाते हैं। क्योंकि इन बुग्यालों की घास पशुओं के लिए बहुत ही पौष्टिक होती हैं। महीनों तक वहां रहने के बाद जब मवेशी पूरी तरह स्वस्थ होकर सुरक्षित घर लौटते हैं, तो भगवान कृष्ण और प्रकृति मां को धन्यवाद स्वरुप ग्रामीण यह त्योहार मनाते हैं।
वर्षों पूर्व इस उत्सव में मेहमानों पर गोबर फेंकने की प्रथा थी, लेकिन बदलते समय के साथ अब इसकी जगह दूध और मट्ठे की होली ने ले ली है।
वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर चमक रही संस्कृति
उत्तराखंड पर्यटन विभाग के विशेष प्रयासों और स्थानीय दयारा पर्यटन विकास समिति के सहयोग से अब यह बटर फेस्टिवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है। इस वर्ष खराब मौसम और हल्की बारिश के बावजूद पर्यटकों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। इस आयोजन से न केवल क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति का संरक्षण हो रहा है, बल्कि रैथल और आसपास के गांवों में होमस्टे तथा स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो रहे हैं।

