ऐ मेरा पाड़ तेन न ज्वानि देखि न विकास अब त टूटी सैरि आस
-कुछ 

यूं छलका राज्य आंदोलनकारी उदय ममगाईं राठी के दिल का दर्द 

दिल्ली : उत्तराखंड राज्य बनाने के लिए जिन आंदोलनकारियों न अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया इस आस में कि एक दिन हमारा पहाड़ भी विकास की दौड़ में अब्बल रहेगा किंतु  22 साल के इंतजार के बाद भी उन्हें उनके सपनों का पहाड़ कहीं नहीं दिखाई देता। सरकारी योजनाएं जिस तरह शहरी इलाकों को ध्यान में रख कर बनाई जा रही हैं उससे उनकी रही सही आस भी टूट रही है। 

उत्तराखंड हमेशा से ही सैनिक बहुल प्रदेश रहा है और अधिकतर सैनिक परिवार पहाड़ में ही रहते हैं।  हाल ही में देहरादून और रुद्रपुर में सैनिक स्कूल खोले जाने के सरकार के फैसले को  शोशल मीडिया पर खूब ट्रोल किया जा रहा हैं सभी इस फैसले को सैनिक हितों के खिलाफ बता रहे हैं। 

इस विषय पर उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी व दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता उदय ममगाईं राठी ने अत्यंत दुखी मन से  कहा कि मैं मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami जी से जानना चाहता हूँ कि उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई लड़ी पहाड़ियों ने, बलिदान दिया पहाड़ के लोगों ने फिर क्यों उन्हीं पहाड़ियों को आज राज्य सरकार धोखे में रख रही है, कौन कहता है पहाड़ों में सैन्य स्कूल नही बन सकता बस जरुरत है तो इच्छाशक्ति की। देहरादून और रुद्रपुर में पहले से ही काफी नामी ग्रामी अनेकों स्कूल हैं फिर सैनिक स्कूल वहीं क्यों? इन स्कूलों की जरुरत तो उन सैनिक परिवारों को है जो पहाड़ों में विषम परिस्थितयों में  अपना जीवन यापन कर रहे हैं और सेना में इन्हीं के बच्चे अपना बलिदान देते हैं।। राज्य और देश के लिए सर्वदा अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले पहाड़ियों से इस तरह का छलावा क्यों ? अगर ऐसा ही चलता रहा तो कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में पहाड़ के हक के लिए हमें एक और लड़ाई अपनी ही सरकार के खिलाफ लड़नी पड़े।




उन्होंने कहा जब पहाड़ पर सैनिक मुख्यालय और IAS प्रशिक्षण केंद्र हो सकता है फिर सैनिक स्कूल क्यों नही ? वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली जी की जन्मभूमि पीरसैंण में पूर्व रक्षामंत्री जी ने उस स्थान को देखते हुए वहां पर सैनिक स्कूल होने की बात कही थी जो कि उचित भी है और 3 जिलों का केंद्र भी,  फिर वहाँ क्यों नही बन सकता, क्या पहाड़ के विकास हेतु मानक बदले नही जा सकते।

अगर ऐसा ही हाल रहा तो मुझे लगता है धीरे धीरे समय आएगा सारे नॉन पहाड़ियों के हाथ मे सत्ता होगी और हम फिर उसी हाल में होंगे जिस हाल में उत्तरप्रदेश के समय मे थे। 




जिस राज्य की स्थापना मात्र पहाड़ की दृष्टि से हुई हो वही पहाड़ आज खोखला नज़र आता हैं। जो लोग कहीं से भी आंदोलन का हिस्सा नही थे नेता बनकर पहाड़ की भोली भाली जनता को धोखा दे रहे हैं।  इसलिए माननीय मुख्यमंत्री जी निवेदन है कि पहाड़ के हितों को ध्यान में रखते हुए उन शहीदों के सपनों को साकार करते हुए उत्तराखण्ड को वैसी पहचान दिलाने की कृपा करें जैसा आंदोलनकारियों ने सोचा था।  

इसलिए माननीय मुख्यमंत्री जी अगर जरा भी पहाड़ का दर्द समझते हो तो योजनाओं का क्रियान्वयन पहाड़ के अनुरूप हो यह प्रदेश की जनता की गुहार है जब माननीय युगपुरुष मोदी जी को केदारबाबा की पहाड़ी इतनी प्रिय है तो फिर उत्तराखण्ड के नेताओं को क्यों अपनी जन्मभूमि से मोह नहीं 

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