पौड़ी : ऐतिहासिक मोरी मेले का भव्य समापन उमड़े हजारों श्रद्धालु नम आंखों से पांडवों को दी विदाई
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पौड़ी : गगवाड़स्यूं घाटी के तमलाग और कुंडी गांव में पिछले 6 महीनों से चल रहे ऐतिहासिक ‘मोरी (मौरी) महापर्व’ का सोमवार 6 जुलाई को भव्य समापन हुआ। महाकुंभ और श्री नंदादेवी राजजात की तर्ज पर हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाले इस अद्वितीय लोकपर्व के अंतिम दिन अगाध आस्था और भक्ति का सैलाब देखने को मिला। आषाढ़ माह की 22 गते को मुख्य मंडाण चौक पर आयोजित अंतिम अनुष्ठान के साथ ही इस 6-मासीय उत्सव को पूर्ण विदाई दी गई। इस आयोजन में शामिल होने के लिए देश विदेश से हजारों प्रवासी श्रद्धालु अपने पैतृक गांव पहुंचे। अब इस पावन लोक उत्सव के साक्षी बनने के लिए स्थानीय निवासियों और प्रवासियों को अगले 12 वर्षों तक का लंबा इंतजार करना होगा। बिना सरकारी मदद के आयोजकों ने इतना भव्य आयोजन कर एक मिसाल पेश की है।
विदाई वेला में भावुक हुए श्रद्धालु, पश्वाओं ने दिया सुख-समृद्धि का आशीर्वाद
समापन के मुख्य दिन तमलाग गांव के ‘चाँदणा चौक’ पर प्राचीन भैरव मंदिर परिसर में सुबह से ही विशेष पूजा-अर्चना शुरू हो गई थी। ‘ढोल सागर’ की गंभीर और पारंपरिक थापों के बीच पांडवों के पश्वा (देव स्वरूप) अंतिम बार अवतरित हुए। पांडव वेशभूषा में सजे पश्वाओं ने जब पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों के साथ अपना अंतिम नृत्य प्रस्तुत किया, तो पूरा परिसर जयकारों से गूंज उठा। इसके बाद देवताओं ने संपूर्ण क्षेत्र की खुशहाली, अच्छी फसल और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद दिया। विदाई के समय उपस्थित ग्रामीणों और प्रवासियों की आंखें नम हो गईं।
वन-वे ट्रैफिक और भारी पुलिस बल के बीच सुचारू रही व्यवस्था
समापन समारोह के मद्देनजर सबदरखाल, कुंडी और तमलाग मोटर मार्ग पर सुबह से ही वाहनों का भारी दबाव देखा गया। पौड़ी गढ़वाल जिला पुलिस और प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाते हुए यातायात को नियंत्रित करने के लिए वन-वे व्यवस्था लागू की थी। तंग पहाड़ी रास्तों पर जाम न लगे, इसके लिए जगह-जगह अस्थायी पार्किंग जोन बनाए गए थे। मेला आयोजन समिति के स्वयंसेवकों और पुलिस बल के आपसी तालमेल के कारण हजारों की भीड़ होने के बावजूद समापन समारोह बिना किसी असुविधा के बेहद शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ।
पलायन पर भारी पड़ी माटी की खुशबू: प्रवासियों की ऐतिहासिक घर वापसी
12 साल बाद आयोजित हुए इस मेले ने पहाड़ों में सामाजिक एकता की एक नई मिसाल पेश की। दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ और देहरादून जैसे महानगरों में रह रहे गगवाड़स्यूं घाटी के हजारों प्रवासी इस समय अपनी जड़ों की ओर लौट आए। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि प्रवासियों को अपनी संस्कृति और मातृभूमि से जोड़ने का महाअभियान है। घाटी के हर घर में मेहमानों की रौनक थी और पूरा क्षेत्र उत्सव के रंग में सराबोर था।
दिसंबर 2025 में हुई थी भव्य शुरुआत
यह मेला मुख्य रूप से पौड़ी गढ़वाल जिले की गगवाड़स्यूं घाटी के तमलाग गांव और कोट ब्लॉक के कुंडी गांव में संयुक्त रूप से आयोजित किया जाता है। इस भव्य उत्सव की शुरुआत दिसंबर में स्थानीय ग्रामीणों द्वारा पौराणिक महाकवि कालिदास और माता कुंती को ससम्मान मंडाण (विशेष पूजा स्थल) में आमंत्रित करने के साथ हुई थी। 12 साल के लंबे इंतजार के बाद लगे इस मेले का उद्घाटन स्थानीय विधायक राजकुमार पोरी द्वारा किया गया था।
महाभारत काल और पांडवों से गहरा नाता
मोरी मेला पूरी तरह से महाभारत कालीन परंपराओं और पांडव संस्कृति को समर्पित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पांडवों ने अपने अज्ञातवास और स्वर्गाश्रम यात्रा के दौरान इस क्षेत्र में समय बिताया था। मेले की शुरुआत से लेकर समापन तक, पूरे 6 महीने तक गांव में प्रतिदिन पारंपरिक वेशभूषा में भव्य पांडव नृत्य का मंचन किया जाता है।

