गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े : आजकल उत्तराखंड के पहाड़ी बाजारों का मिजाज बदल रहा है। मैदानी क्षेत्रों से आने वाली मिलावटी और केमिकल युक्त मिठाइयों ने पहाड़ों के दूर-दराज के बाजारों को भी पाट दिया है। रंग-बिरंगी आधुनिक मिठाइयों के इस दौर में, चमोली जिले के गैरसैंण के धुनारघाट से एक ऐसी सुखद तस्वीर सामने आ रही है, जो हमारी समृद्ध परंपरा और स्वरोजगार की एक मिसाल है। यहाँ के स्थानीय युवा संजय ने मैदानी चकाचौंध के सामने घुटने टेकने के बजाय अपने पुश्तैनी हुनर को हथियार बनाया है। आज गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े न केवल लोगों की जुबान पर चढ़कर बोल रहे हैं, बल्कि पहाड़ों में पलायन के खिलाफ स्वरोजगार की एक नई इबारत भी लिख रहे हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!पुश्तैनी हुनर बना स्वरोजगार की रीढ़
संजय की दुकान पर जाते ही आपको आधुनिक मिठाइयों का कोई अंबार नहीं दिखेगा। उनकी दुकान की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ मिठाइयों के नाम पर सिर्फ और सिर्फ गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े ही मिलते हैं। संजय बताते हैं कि पेड़े बनाने की यह अद्भुत कला उन्होंने किसी बड़े होटल या संस्थान से नहीं, बल्कि अपने ही घर में अपने पिता और दादा से सीखी है। जब पहाड़ों से लोग रोजगार की तलाश में मैदानों की तरफ भाग रहे थे, तब संजय ने अपनी इस पुश्तैनी विरासत पर भरोसा जताया। आज यही हुनर उनके और उनके परिवार के आत्मनिर्भर बनने का सबसे बड़ा आधार बन चुका है।
कड़ाही की धीमी आंच और शुद्ध दूध का जादू
इन पेड़ों के बेमिसाल स्वाद का राज इसकी शुद्धता और पारंपरिक निर्माण विधि में छुपा है। संजय रोज़ाना सुबह-सुबह आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से शुद्ध और ताजा दूध इकट्ठा करते हैं। इसके बाद लोहे की भारी कड़ाही में दूध को घंटों तक धीमी आंच पर पारंपरिक तरीके से मावा बनने तक ‘खाँड़ा’ (काढ़ा) जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के कृत्रिम रंग, प्रिजर्वेटिव या मिलावटी खोये का इस्तेमाल कतई नहीं होता। शुद्ध दूध को कड़ाही में खांडकर तैयार किए गए इन गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े का स्वाद इतना लाजवाब होता है कि खाने वाले को पहाड़ों की खुशबू का अहसास होता है।
रोजाना 50 किलो दूध की खपत, हाथों-हाथ बिक जाते हैं पेड़े
संजय के इस छोटे से गृह उद्योग की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे रोजाना करीब 50 किलो शुद्ध दूध से 15 से 20 किलो पेड़े तैयार करते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि दुकान पर पेड़े बनकर आते ही कुछ ही घंटों में हाथों-हाथ बिक जाते हैं। स्थानीय लोग तो संजय के इस स्वाद के दीवाने हैं ही, साथ ही गैरसैंण और धुनारघाट से गुजरने वाले मुसाफिर, सैलानी और राहगीर भी गाड़ी रोककर इन गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े का स्वाद लेना और इन्हें अपने साथ घर ले जाना नहीं भूलते। दूर-दूर से लोग सिर्फ इन पेड़ों का जायका चखने के लिए धुनारघाट खिंचे चले आते हैं।
पलायन रोकने और वोकल फॉर लोकल की जीती-जागती मिसाल
संजय का यह प्रयास उत्तराखंड सरकार के “वोकल फॉर लोकल” और स्वरोजगार अभियान को धरातल पर सच साबित कर रहा है। जहां एक ओर मैदानी क्षेत्रों की मिठाइयों के कारण स्थानीय दुग्ध उत्पादकों को सही बाजार नहीं मिल पाता, वहीं संजय सीधे गांवों से दूध खरीदकर स्थानीय किसानों की आर्थिकी को भी मजबूत कर रहे हैं। गैरसैंण के पारंपरिक पेड़े की यह सफलता यह संदेश देती है कि यदि पहाड़ों में रहकर अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और पुश्तैनी कला को आधुनिक बाजार के साथ सही ढंग से पेश किया जाए, तो महानगरों से बेहतर आजीविका अपने ही घर-आंगन में पैदा की जा सकती है। संजय आज उत्तराखंड के उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं, जो स्वरोजगार की राह तलाश रहे हैं।

