कर्णप्रयाग (चमोली) : देवभूमि उत्तराखंड की अलौकिक संस्कृति, अटूट आस्था और लोक परंपराओं का अद्भुत संगम इन दिनों चमोली जिले में देखने को मिल रहा है। यहाँ की समृद्ध उत्तराखंड देव संस्कृति के तहत कर्णप्रयाग विकासखंड के कोट-कंडारा में दो दशकों (20 वर्ष) के लंबे इंतजार के बाद पारंपरिक नंदाष्टमी कौथिग (मेला) का भव्य शुभारंभ हुआ है। इस ऐतिहासिक अवसर पर जब मां दशमद्वार अपने धर्म भाइयों लाटू देवता और केदारू देवता से मिलीं, तो पूरा क्षेत्र ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इस भावुक और दिव्य पल का गवाह बनने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु कोट-कंडारा पहुंचे हैं।

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7 किलोमीटर की पैदल यात्रा और भाइयों से मिलीं मां दशमद्वार

बृहस्पतिवार सुबह से ही क्षेत्र के विभिन्न मंदिरों में पारंपरिक पूजा-अर्चना और अनुष्ठान शुरू हो गए थे। हिंडाली स्थित मां दशमद्वार के मंदिर, नौली के लाटू देवता और स्वर्का के केदारू देवता के मंदिर में विशेष पूजा की गई। इसके बाद हिंडाली से मां दशमद्वार की डोली, नौली से लाटू देवता का निशान और स्वर्का से केदारू देवता का पावन निशान कोट-कंडारा के दयोल मंदिर के लिए रवाना हुए।

भक्ति की पराकाष्ठा तब देखने को मिली जब स्वर्का से पुजारी और ग्रामीण केदारू देवता के निशान को लेकर उल्फाड़ा, ढुंग-ल्वाली आदि दुर्गम गांवों से होते हुए करीब 7 किलोमीटर की कठिन पैदल दूरी तय कर कोट-कंडारा पहुंचे। दयोल मंदिर परिसर में जैसे ही मां दशमद्वार का अपने भाइयों लाटू और केदारू देवता से मिलन हुआ, श्रद्धालु भावुक हो उठे।

इस अलौकिक दृश्य के दौरान देवताओं के पश्वाओं (देव-अवतारों) ने ढोल-दमाऊं और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर भव्य देवनृत्य किया। वहीं, क्षेत्र की महिलाओं ने मां नंदा और देवताओं के स्वागत में पारंपरिक मंगलकारी जागर गाए। उत्तराखंड देव संस्कृति के इस अद्वितीय रंग को सहेजने के लिए अगले चार दिनों तक यहां विभिन्न देव अनुष्ठान और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस मौके पर मंदिर समिति के अध्यक्ष गजपाल कठैत, सचिव धर्मेंद्र रावत, लक्ष्मण सिंह, मनोज रावत, सतेंद्र बिष्ट और जिला पंचायत सदस्य सरोजनी देवी सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

श्रीनंदा देवी राजजात के वापसी पड़ावों की अनदेखी पर फूटा गुस्सा

एक तरफ जहाँ उत्सव का माहौल है, वहीं दूसरी ओर थराली से सुविधाओं को लेकर नाराजगी की आवाज भी उठी है। प्रसिद्ध श्रीनंदा देवी राजजात के वापसी मार्ग पर विकास कार्यों की मांग को लेकर देवराड़ा मंदिर समिति ने जिलाधिकारी, राजजात समिति और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

मंदिर समिति के अध्यक्ष भुवन हटवाल ने सरकार और प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि हमारी उत्तराखंड देव संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक राजजात के जाने वाले पड़ावों के सौंदर्यीकरण और सुविधाओं के लिए तो करोड़ों रुपये की धनराशि जारी की गई, लेकिन वापसी मार्ग की पूरी तरह से अनदेखी की गई। उन्होंने बताया कि मां नंदा की डोली होमकुंड से छह महीने के लिए देवराड़ा पहुंच चुकी है, लेकिन देवी के वापसी के पड़ावों पर श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के लिए बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही इन पड़ावों का विकास नहीं किया गया, तो आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।

गौचर के पनाई सेरा मंदिर में मां कालिंका के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

चमोली जिले के ही गौचर क्षेत्र से भी भक्ति की एक बेहद सुंदर तस्वीर सामने आ रही है जो उत्तराखंड देव संस्कृति की जड़ों को और मजबूत करती है। पनाई सेरा मंदिर में मां कालिंका देवी का चार दिवसीय प्रवास चल रहा है। इस दौरान माता रानी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए हर दिन भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं।

भक्तगण मां कालिंका को प्रसन्न करने के लिए वस्त्र, शृंगार सामग्री, फल और अन्य धार्मिक सामग्री भेंट कर रहे हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष जगदीश कनवासी ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। साथ ही, माता के इस चार दिवसीय प्रवास को खास बनाने के लिए मंदिर परिसर में भव्य जागरण और कीर्तन का आयोजन भी किया जा रहा है, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया है।

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